भोपाल/मंदसौर। मध्य प्रदेश में आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली ‘108 संजीवनी एक्सप्रेस’ एम्बुलेंस सेवा इन दिनों खुद वेंटिलेटर पर सांसें गिन रही है। बड़े जोर-शोर और दावों के साथ शुरू की गई इस सेवा के अंतर्गत मध्य प्रदेश में 108 एम्बुलेंस की खस्ता हालत (MP 108 Ambulance Bad Condition) किसी से छिपी नहीं है। हादसे, दुर्घटना या गंभीर बीमारी के वक्त लोगों को तत्काल अस्पताल पहुंचाने का जिम्मा संभालने वाली यह एम्बुलेंस सेवा अब मरीजों के लिए उम्मीद के बजाय आफत और बेबसी का सबब बन चुकी है। राज्य के ग्रामीण अंचलों से लेकर जिला मुख्यालयों तक आपातकाल के समय एम्बुलेंस को कॉल लगाने के दो-दो घंटे बाद भी सेवा उपलब्ध नहीं हो पा रही है, जिससे कई बार मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।

घंटों का इंतजार और रास्ते में टूटती सांसें: जमीनी हकीकत

आपातकालीन चिकित्सा में ‘गोल्डन ऑवर’ यानी दुर्घटना के बाद के पहले एक घंटे का समय सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी समय में मरीज की जान बचाई जा सकती है। लेकिन मध्य प्रदेश में 108 एम्बुलेंस की खस्ता हालत के कारण यह गोल्डन ऑवर सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है। सड़कों पर दुर्घटनाग्रस्त होकर तड़प रहे घायलों को समय पर चिकित्सा नहीं मिल पा रही है। मंदसौर और नीमच जैसे सीमावर्ती जिलों में स्थिति और भी विकट है। हाल ही में मल्हारगढ़ के पास हाईवे पर हुए मल्हारगढ़ सड़क हादसे जैसी घटनाओं के दौरान घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए तुरंत सुरक्षित परिवहन की आवश्यकता होती है, लेकिन सरकारी एम्बुलेंस के न पहुंचने से स्थानीय लोग अपने वाहनों या पुलिस की मदद से घायलों को अस्पताल ले जाने को मजबूर होते हैं।

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रेफर किए गए गंभीर मरीजों की स्थिति तो और भी बदतर है। जब जिला अस्पताल या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर किसी मरीज को उच्च चिकित्सा संस्थान (जैसे इंदौर या उज्जैन) के लिए रेफर करते हैं, तो परिजनों को एम्बुलेंस के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। इस दौरान मरीज की हालत इतनी गंभीर हो जाती है कि कई बार इलाज मिलने से पहले ही उसकी मृत्यु हो जाती है।

गैराज बने एम्बुलेंस के कब्रिस्तान: कबाड़ में तब्दील हो रहीं गाड़ियां

पूरे प्रदेश के विभिन्न जिलों में यदि आप स्थानीय मोटर गैराजों या वर्कशॉप का दौरा करेंगे, तो आपको वहां पीली और सफेद रंग की 108 एम्बुलेंस कतारों में खड़ी मिलेंगी। इनमें से कई गाड़ियों के टायर फटे हुए हैं, किसी का इंजन सीज हो चुका है, तो किसी की बॉडी पूरी तरह सड़ चुकी है। मेंटेनेंस के अभाव में ये एम्बुलेंस आज भंगार (स्क्रैप) में तब्दील होने की कगार पर हैं। गैराज संचालकों का कहना है कि गाड़ियों की मरम्मत तो की जा सकती है, लेकिन बिलों का भुगतान नहीं होने के कारण वे भी अब नई गाड़ियां हाथ में लेने से बच रहे हैं।

इसके चलते सड़कों पर दौड़ने वाली एम्बुलेंस की संख्या लगातार कम हो रही है। जो एम्बुलेंस सड़कों पर हैं भी, उनकी हालत इतनी जर्जर है कि वे खुद कब रास्ते में बंद हो जाएं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस प्रकार की खराब लॉजिस्टिक्स का असर शामगढ़ जैसे संवेदनशील इलाकों में भी देखा जा सकता है, जहां शामगढ़ सिविल अस्पताल में शवों को लाने या गंभीर घायलों को रेफर करने के दौरान एम्बुलेंस की भारी किल्लत का सामना करना पड़ा है।

ठेकेदारों और सरकार के बीच भुगतान का विवाद: दबे जुबान में बड़ा खुलासा

108 एम्बुलेंस सेवा का संचालन वर्तमान में जिन ठेकेदार या टेंडर कंपनियों के पास है, उनके स्थानीय अधिकारी दबे जुबान में सरकार से भुगतान न मिलने की बात स्वीकार कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, राज्य स्वास्थ्य विभाग द्वारा एम्बुलेंस संचालन के एवज में किए जाने वाले मासिक या त्रैमासिक भुगतानों में लंबे समय से देरी की जा रही है। टेंडर कंपनियों का कहना है कि जब तक सरकार की ओर से बकाया राशि जारी नहीं की जाती, तब तक वे ड्राइवरों का वेतन, गाड़ियों का मेंटेनेंस और डीजल का खर्च वहन करने में असमर्थ हैं।

सरकारी विभागों और ठेकेदारों की इस खींचतान का सीधा खामियाजा प्रदेश की निर्दोष जनता को भुगतना पड़ रहा है। मध्य प्रदेश शासन के स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक नीतिगत निर्णयों और बजट आवंटन की जानकारी के लिए आप लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, मध्य प्रदेश (Department of Health and Family Welfare, MP) की वेबसाइट देख सकते हैं।

अस्पतालों में झड़प: डॉक्टर और तीमारदार आमने-सामने

इस बदहाल व्यवस्था का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि इससे अस्पतालों में डॉक्टरों और मरीजों के परिजनों के बीच विवाद और हिंसक झड़पें बढ़ रही हैं। जब अस्पताल में ड्यूटी डॉक्टर किसी मरीज को रेफर करता है, तो परिजन तुरंत एम्बुलेंस उपलब्ध कराने की मांग करते हैं। अस्पताल का स्टाफ 108 कॉल सेंटर पर सूचना तो दे देता है, लेकिन वहां से घंटों तक कोई जवाब नहीं आता। ऐसे में आक्रोशित परिजन डॉक्टरों और नर्सों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए हंगामा शुरू कर देते हैं।

पुलिस की 112 डायल कार बनी जीवनदायिनी: उठा रही एम्बुलेंस का जिम्मा

मध्य प्रदेश में जब 108 एम्बुलेंस की सेवा समय पर नहीं मिलती, तो घायलों और मरीजों के लिए अंतिम सहारा पुलिस की डायल 112 गाड़ियां बनती हैं। गौरतलब है कि पुलिस की पुरानी डायल 100 सेवा अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और उसका स्थान एकीकृत आपातकालीन सेवा डायल 112 ने ले लिया है। जहां पुलिस का काम कानून-व्यवस्था संभालना है, वहां अब पुलिसकर्मी अपनी डायल 112 वाहनों में गंभीर मरीजों को लादकर अस्पताल पहुंचाने को मजबूर हैं।

निश्चित रूप से पुलिस का यह मानवीय चेहरा सराहनीय है, लेकिन यह व्यवस्था का एक बहुत बड़ा फेलियर है। पुलिस की गाड़ियों में न तो स्ट्रेचर होता है, न ही फर्स्ट-एड किट और न ही ऑक्सीजन सिलेंडर। ऐसे में गंभीर मरीज को बिना किसी मेडिकल सपोर्ट के पुलिस वाहन में ले जाना बेहद जोखिम भरा होता है।

इसी लचर स्वास्थ्य व्यवस्था का एक ताजा मामला हाल ही में गुरुवार रात को सामने आया, जब क्षेत्र के ग्राम सगोरीया के व्यास परिवार को एक गंभीर मरीज के लिए दो घंटे तक भी एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकी। परेशान परिजनों द्वारा काफी गुहार लगाने के बाद भी समय पर एम्बुलेंस नहीं पहुंची, जिसका दर्द बयां करता एक वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह वीडियो प्रशासनिक दावों की पोल खोलते हुए व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर कर रहा है।

भोपाल से सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल: शिकायतों का कोई समाधान नहीं

इस पूरी व्यवस्था का ढर्रा बिगड़ने का एक मुख्य कारण यह भी है कि 108 एम्बुलेंस का पूरा नियंत्रण और शिकायत निवारण केंद्र भोपाल में सेंट्रलाइज्ड (केंद्रीयकृत) है। यदि मंदसौर के किसी सुदूर गांव का व्यक्ति एम्बुलेंस न आने की शिकायत करना चाहता है, तो उसका फोन सीधे भोपाल कॉल सेंटर पर जाता है। वहां के कंप्यूटर ऑपरेटर शिकायत तो दर्ज कर लेते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर अधिकारियों (जैसे जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी – CMHO) को इसकी त्वरित सूचना या कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं होता। आम आदमी को यह समझ ही नहीं आता कि वह अपनी गुहार लेकर किसके पास जाए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत इस एम्बुलेंस सेवा के अनुबंधों और दिशा-निर्देशों को समझने के लिए आप राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्य प्रदेश (NHM MP) की गाइडलाइंस का अध्ययन कर सकते हैं।

सुधार की तत्काल आवश्यकता

मध्य प्रदेश में 108 एम्बुलेंस की खस्ता हालत को सुधारने के लिए सरकार को तत्काल कड़े कदम उठाने होंगे। सबसे पहले टेंडर कंपनियों के लंबित भुगतानों का निपटारा करना होगा ताकि मेंटेनेंस के अभाव में गैराजों में सड़ रही गाड़ियों को दोबारा सड़कों पर उतारा जा सके। इसके साथ ही, जिला स्तर पर स्वास्थ्य अधिकारियों को एम्बुलेंस के संचालन की निगरानी और नियंत्रण का अधिकार दिया जाना चाहिए। जब तक व्यवस्था का विकेंद्रीकरण नहीं होगा और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक गरीब और लाचार मरीज इसी तरह सड़कों पर एम्बुलेंस के इंतजार में दम तोड़ते रहेंगे।


विशेष रिपोर्ट: कैलाश विश्वकर्मा (संपादक, यशस्वी दुनिया)

कैलाश विश्वकर्मा