नीमच में अफीम नीति 2026-27 को लेकर हाल ही में नारकोटिक्स विभाग की एक अहम बैठक आयोजित हुई। अफीम बेल्ट के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी हलचल शुरू हो चुकी है। इस महत्वपूर्ण बैठक में मंदसौर संसदीय क्षेत्र के सांसद सुधीर गुप्ता ने किसानों के हित में नई तकनीक और नीतियों को लेकर बड़े सुझाव रखे। नई ‘कलर मैचिंग लाइब्रेरी’ तकनीक ने अफीम उत्पादक किसानों के चेहरों पर मुस्कान ला दी है और सिस्टम में बैठे बिचौलियों के पसीने छुड़ा दिए हैं।

अफीम नीति 2026-27 में सांसद सुधीर गुप्ता के प्रमुख सुझाव

सांसद सुधीर गुप्ता ने कहा कि आगामी वर्ष के लिए औसत मॉर्फीन मानक 3.5 प्रतिशत निर्धारित किया जाए, ताकि प्राकृतिक परिस्थितियों से प्रभावित किसानों को राहत मिल सके। उन्होंने ओलावृष्टि, अतिवृष्टि एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों के लाइसेंस नवीनीकरण में विशेष छूट देने की मांग भी रखी।

उन्होने बैठक में कहा कि वर्ष 1998-99 से 2022-23 तक 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक औसत उत्पादन वाले किसानों को पुनः नीति में शामिल किया जाए तथा सभी सीपीएस किसानों को न्यूनतम 10-10 आरी क्षेत्र के लाइसेंस प्रदान किए जाएं। साथ ही पिछले पांच वर्षों के प्रदर्शन के आधार पर पात्र सीपीएस किसानों को चीरा पद्धति में शामिल करने और 900 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक पोस्ता भूसा उत्पादन देने वाले किसानों को भी चीरा पद्धति का लाभ देने पर विचार किया जाए।

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बैठक में सीपीएस किसानों के लंबित भुगतान शीघ्र जारी करने, गुणवत्ता के आधार पर घटिया घोषित अफीम की फैक्ट्री रिपोर्ट सीधे संबंधित कार्यालयों को उपलब्ध कराने तथा 6 प्रतिशत से अधिक मॉर्फीन वाले किसानों को पुनः लाइसेंस का लाभ देने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई। साथ ही वर्ष 1995-96 से 2022-23 तक ऐसे पात्र किसानों को भी आगामी नीति में शामिल करने का सुझाव दिया गया।

पुराने रिकॉर्ड और नामांतरण पर अहम सुझाव

सांसद ने कहा कि जिन गांवों का पुराना खसरा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, वहां किसानों के पास उपलब्ध वैध दस्तावेजों के आधार पर लाइसेंस जारी किए जाएं। पूर्व वर्षों में फसल चोरी के कारण निरस्त लाइसेंसों की पुनः समीक्षा कर राहत प्रदान की जाए तथा वर्ष 1997-98 की व्यापक ओलावृष्टि को ध्यान में रखते हुए विशेष औसत मानकर किसानों को राहत दी जाए।

उन्होंने कहा कि जिन किसानों की भूमि दूसरे गांव में स्थित है, उन्हें निकटतम गांव में लाइसेंस संचालन की अनुमति मिले। जिन किसानों के वैध उत्तराधिकारी नहीं हैं, उनकी विधिवत वसीयत के आधार पर नामांतरण की व्यवस्था लागू हो तथा जिन परिवारों में परंपरागत रूप से एक से अधिक लाइसेंस रहे हैं, उनके वैध उत्तराधिकारियों के नाम पर भी लाइसेंस स्थानांतरित किए जाएं।

दूध का दूध, पानी का पानी: ‘कलर मैचिंग लाइब्रेरी’ का हाई-टेक प्रहार

इस बार की अफीम नीति 2026-27 में दो मुख्य मुद्दों को आधार बनाया गया है। सालों से अफीम किसान इस खौफ में जीते थे कि लैब टेस्टिंग में जरा सी हेराफेरी हुई और उनकी बरसों की मेहनत (अफीम का पट्टा) एक झटके में कट जाएगी। लेकिन अब… नो हेराफेरी, नो घूसखोरी!

मैदान में उतरी नई तकनीक

अब मॉर्फिन की जांच के लिए 250-टोन की अत्याधुनिक ‘कलर मैचिंग लाइब्रेरी’ का इस्तेमाल किया जा रहा है।

100% पारदर्शिता का गारंटी कार्ड: यह ऐसी डिजिटल और अचूक तकनीक है जो अफीम की शुद्धता का फैसला बिना किसी इंसानी दखल के करेगी। यानी अब जांच में पूरी तरह ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ होगा!

खत्म हुआ 10 हजार पट्टों का खौफ

इस बेजोड़ तकनीक का ही जलवा है कि पहले जो हर साल 10,000 किसानों के पट्टे काट दिए जाते थे, वो काला दौर अब पूरी तरह से बंद हो चुका है!

बिना बाबूराज के पट्टों का नामांतरण

अफीम किसानों ने सांसद गुप्ता के सामने साफ लफ्जों में अपनी सबसे बड़ी दुखती रग पर बात रखी है। किसानों की मांग है कि परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद अफीम का पट्टा दफ्तरों की फाइलों और बाबूराज के चक्करों में न फंसे!

मुखिया की मौत के बाद, अफीम का पट्टा बिना किसी देरी के, पहली प्राथमिकता (Priority) के आधार पर मृतक की पत्नी या मां के नाम ट्रांसफर किया जाए।

अगर यह मांग नई अफीम नीति 2026-27 में शामिल होती है, तो यह अंचल की हजारों माताओं और बहनों के लिए सबसे बड़ा आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा कवच साबित होगी। अब किसानों को अपनी ही जमीन और हक के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

‘कलर मैचिंग लाइब्रेरी’ जहां धांधली के रास्ते बंद करेगी, वहीं नामांतरण का यह नया नियम पीड़ित परिवारों को संबल देगा। अब देखना होगा कि इन सुझावों पर दिल्ली की अंतिम मुहर कब लगती है!

रिपोर्ट: कैलाश विश्वकर्मा (संपादक, यशस्वी दुनिया)

कैलाश विश्वकर्मा