नई दिल्ली/दुबई/बीजिंग: साल 2026 वैश्विक राजनीति और अर्थव्यस्था के लिए ‘अग्निपरीक्षा’ का वर्ष साबित हो रहा है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध और अब पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया को एक गंभीर ग्लोबल ऊर्जा संकट 2026 (Global Energy Crisis 2026) के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। हाल ही में संपन्न हुआ पीएम मोदी का यूएई दौरा और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा इसी संकट को टालने और अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की एक बड़ी कूटनीतिक कवायद के रूप में देखे जा रहे हैं।
पीएम मोदी का यूएई दौरा: ऊर्जा सुरक्षा पर ‘मास्टरस्ट्रोक’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने यूएई दौरे के दौरान वैश्विक मंच से संबोधित करते हुए स्पष्ट कहा कि यह दशक चुनौतियों से भरा है। उन्होंने रेखांकित किया कि कैसे महामारियों और युद्धों ने दुनिया की सप्लाई चेन को ध्वस्त कर दिया है। पीएम मोदी ने ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में जारी तनाव के बीच भारत की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए यूएई के साथ कई रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) और लंबी अवधि के एलपीजी (LPG) आपूर्ति समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
प्रधानमंत्री ने देशवासियों और विश्व समुदाय से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ने की अपनी पुरानी अपील को फिर से दोहराया है, जो भविष्य के गैर-नवीकरणीय ऊर्जा संकट (Non-Renewable Energy Crisis) को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण है।
2026 का वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य और गहराता ऊर्जा संकट
डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा: क्या है इसका ‘गहरा अर्थ’?
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा ने दुनिया भर के विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस यात्रा का गहरा अर्थ केवल व्यापार नहीं, बल्कि चीन के साथ मिलकर ईरान युद्ध के वैश्विक प्रभाव को सीमित करना है। ट्रंप जानते हैं कि यदि खाड़ी देशों से होने वाली तेल और गैस की आपूर्ति पूरी तरह ठप हुई, तो अमेरिकी और चीनी दोनों अर्थव्यवस्थाएं ढह सकती हैं। ट्रंप और शी जिनपिंग की यह मुलाकात ‘रणनीतिक स्थिरता’ की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा मार्गों को खुला रखना और युद्ध की आग को और फैलने से रोकना है।
भविष्य का संकट: गैर-नवीकरणीय ऊर्जा की सीमाएं
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में गैर-नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (कोयला, तेल, गैस) पर निर्भरता ही युद्धों का मुख्य कारण बनेगी। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट भी संकेत देती है कि 2026 के बाद से दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन की मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर पैदा होगा। ऐसे में भारत का ‘मिशन रफ़्तार’ और सौर ऊर्जा पर जोर भविष्य के अंधेरे से बचने का एकमात्र रास्ता है।
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