गरोठ/उज्जैन: भारत में सड़क और आधारभूत संरचनाओं (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के क्षेत्र में हो रहा तेजी से विकास जहां एक ओर यातायात को सुगम बना रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे जुड़े पर्यावरणीय पहलुओं को भी अब गंभीरता से लिया जा रहा है। इसी कड़ी में, मालवा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा माने जाने वाले गरोठ-उज्जैन फोरलेन मार्ग को अब केवल कंक्रीट की सड़क न रखकर, एक ‘ग्रीन कॉरिडोर’ (हरित गलियारे) के रूप में विकसित किए जाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू हो गया है। एक तरफ जहां इस पर्यावरण अनुकूल पहल का पर्यावरणविदों, प्रकृति प्रेमियों और स्थानीय जागरूक नागरिकों द्वारा खुले दिल से स्वागत किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उन प्रॉपर्टी निवेशकों, छोटे-बड़े भू-मालिकों और रियल एस्टेट कारोबारियों की नींद उड़ गई है, जिन्होंने भविष्य में भारी मुनाफे की उम्मीद के साथ फोरलेन के किनारे महंगे दामों पर जमीनें और प्लॉट खरीदे थे।

Garoth Ujjain Fourlane Green Corridor

फोरलेन के दोनों ओर शुरू हुई वृक्षारोपण की व्यापक तैयारी

प्राप्त जानकारी और मौके के हालातों की जमीनी पड़ताल के अनुसार, उज्जैन से गरोठ तक जाने वाले इस नव-निर्मित फोरलेन मार्ग के दोनों तरफ ग्रीन कॉरिडोर विकसित करने की तैयारियां जमीनी स्तर पर बेहद तेज गति से शुरू हो चुकी हैं। सड़क के दोनों ओर लगी लोहे की सुरक्षा गार्डर (क्रैश बैरियर) से लगभग 50 फीट की दूरी पर गड्ढे खोदने का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। कई किलोमीटर तक यह कार्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो इस बात का संकेत है कि प्रशासन इस मानसून सीजन में बड़े पैमाने पर सघन वृक्षारोपण करने के लिए पूरी तरह से तैयार है।

पौधों की सुरक्षा को लेकर भी संबंधित विभागों ने इस बार विशेष रणनीति बनाई है। अक्सर देखा गया है कि सड़कों के किनारे लगाए गए पौधे आवारा पशुओं का शिकार हो जाते हैं या मानवीय लापरवाही के कारण नष्ट हो जाते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए योजना के तहत सड़क के दोनों ओर पोल लगाकर बाउंड्री या मजबूत तार फेंसिंग तैयार की जाएगी। इससे न केवल लगाए जाने वाले पौधों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि एक व्यवस्थित और सुंदर हरित पट्टी भी आकार ले सकेगी। यह पूरी पहल न केवल आने वाले समय में सड़क यात्रा को सुखद, ठंडा और छायादार बनाएगी, बल्कि इस पूरे मालवा क्षेत्र के इकोसिस्टम और जैव विविधता के लिए भी एक वरदान साबित होगी।

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प्रॉपर्टी निवेशकों और भू-मालिकों को लगा बड़ा झटका

फोरलेन किनारे इस वृहद स्तर पर ग्रीन कॉरिडोर बनने की खबर ने क्षेत्र के रियल एस्टेट बाजार और प्रॉपर्टी कारोबार में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो जब से इस एक्सप्रेसवे और फोरलेन परियोजना की आधिकारिक घोषणा हुई थी, तब से ही इस पूरे बेल्ट (गरोठ, भानपुरा, सुवासरा से लेकर उज्जैन तक) में जमीनों के दाम आसमान छूने लगे थे। ग्रामीण इलाकों की साधारण कृषि भूमि भी व्यावसायिक दरों पर बिकने लगी थी।

बड़ी संख्या में स्थानीय और बाहरी निवेशकों, प्रॉपर्टी डीलरों और आम लोगों ने अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई इस उम्मीद के साथ यहां के प्लॉटों और कृषि भूमियों में लगा दी थी कि भविष्य में फोरलेन के चालू होने पर यहां बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान, आलीशान होटल, ढाबे, पेट्रोल पंप, लॉजिस्टिक पार्क, वेयरहाउस, आवासीय कॉलोनियां और अन्य कमर्शियल कॉम्प्लेक्स विकसित होंगे। निवेशकों का यह पक्का मानना था कि हाईवे के किनारे की जमीनें ‘सोने की खदान’ साबित होंगी और यहां व्यावसायिक गतिविधियां तेजी से बढ़ने पर उनकी भूमि का मूल्य कई गुना बढ़ जाएगा।

लेकिन अब, अचानक सड़क के दोनों ओर 50 फीट तक हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) विकसित किए जाने की इस तैयारी ने उनके इन सुनहरे सपनों पर जैसे पानी फेर दिया है। कई निवेशक जो अपनी जमीन पर व्यावसायिक निर्माण का नक्शा पास कराने की योजना बना रहे थे, वे अब असमंजस और भारी चिंता में हैं।

ग्रीन बेल्ट के कड़े नियम और निवेशकों की चिंता का मूल कारण

सरकारी नियमों और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की गाइडलाइंस के अनुसार, हाईवे के किनारे एक बार ग्रीन बेल्ट या हरित पट्टी घोषित होने के बाद उस निर्धारित दायरे (जो कि इस मामले में लगभग 50 फीट बताया जा रहा है) में किसी भी प्रकार के स्थायी व्यावसायिक, औद्योगिक या आवासीय निर्माण पर सख्त कानूनी पाबंदियां लागू हो जाती हैं। ऐसे में जिन किसानों, निवेशकों या व्यापारियों की जमीनें इस 50 फीट के दायरे में आ रही हैं, या जिनका ‘फ्रंट’ (सड़क की ओर खुलने वाला मुख्य हिस्सा) इस ग्रीन बेल्ट के कारण पूरी तरह से ब्लॉक हो जाएगा, उनके लिए उस जमीन का व्यावसायिक उपयोग कर पाना लगभग असंभव हो जाएगा।

बिना फ्रंट के किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान (जैसे होटल या पेट्रोल पंप) का कोई मोल नहीं रह जाता है। इस स्थिति ने प्रॉपर्टी निवेशकों को भारी चिंता और निराशा में डाल दिया है। जिन जमीनों को ‘कमर्शियल हब’ के रूप में देखा जा रहा था, वे अब केवल ‘कृषि भूमि’ या ‘ग्रीन जोन’ तक सीमित रह जाने के खतरे का सामना कर रही हैं। कई लोगों का कहना है कि उन्होंने बैंक से भारी-भरकम लोन लेकर ये जमीनें खरीदी थीं, और अब अगर वे इनका व्यावसायिक उपयोग नहीं कर पाएंगे, तो लोन चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।

पर्यावरण संरक्षण और भविष्य के दृष्टिकोण से एक बेहद सराहनीय कदम

हालांकि निवेशकों और प्रॉपर्टी डीलरों को इस फैसले से भारी आर्थिक नुकसान की आशंका है और उनका विरोध भी स्वभाविक है, लेकिन पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और आम नागरिकों के नजरिए से देखा जाए तो यह एक बेहद सकारात्मक, दूरदर्शी और समय की मांग के अनुसार उठाया गया आवश्यक कदम है। आज के समय में जब ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी समस्याएं विकराल रूप धारण कर चुकी हैं, तब बढ़ते वाहनों के दबाव और उससे उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए आधुनिक सड़कों के किनारे सघन वृक्षारोपण कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता बन गया है।

गरोठ-उज्जैन फोरलेन पर इस प्रस्तावित ग्रीन कॉरिडोर के बनने से कई महत्वपूर्ण और दूरगामी लाभ होंगे:

  • कार्बन सिंक और वायु प्रदूषण पर नियंत्रण: हाईवे पर दौड़ने वाले हजारों भारी और हल्के वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं, कार्बन डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर (PM) को ये हजारों पेड़ सोखकर एक प्राकृतिक ‘कार्बन सिंक’ का काम करेंगे और आसपास की हवा को शुद्ध करेंगे।
  • माइक्रो-क्लाइमेट और तापमान में कमी: कंक्रीट और डामर की सड़कों के कारण होने वाले ‘हीट आइलैंड प्रभाव’ (Heat Island Effect) को कम करने में पेड़ों की छाया मदद करेगी। इससे गर्मी के दिनों में सड़क और आसपास के क्षेत्र का तापमान 2 से 3 डिग्री तक कम रह सकता है, जिससे टायर फटने जैसी दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी।
  • ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) से बड़ी राहत: पेड़ों की सघन और चौड़ी कतारें हाईवे पर चलने वाले तेज रफ्तार वाहनों के शोर को सोखने और रोकने के लिए एक शानदार प्राकृतिक ध्वनिरोधक बैरियर (Sound Barrier) का काम करेंगी, जिससे आसपास बसे गांवों, बस्तियों और स्कूलों को ध्वनि प्रदूषण से राहत मिलेगी।
  • भूस्खलन और मिट्टी के कटाव पर रोक: बारिश के दिनों में सड़क के किनारों की मिट्टी कटने का खतरा रहता है। पेड़ों की गहरी जड़ें मिट्टी को मजबूती से बांधकर रखेंगी, जिससे भूस्खलन और कटाव रुकेगा और सड़क की उम्र भी बढ़ेगी।
  • जैव विविधता को बढ़ावा: यह ग्रीन कॉरिडोर स्थानीय पक्षियों, छोटे वन्यजीवों और कीटों के लिए एक नया प्राकृतिक आवास प्रदान करेगा, जो पर्यावरण संतुलन के लिए बहुत जरूरी है।

विकास (Development) और हरियाली (Ecology) के बीच संतुलन की अहम आवश्यकता

वर्तमान का यह पूरा परिदृश्य एक बेहद जटिल और विचारणीय स्थिति को दर्शाता है जहां ‘आर्थिक और ढांचागत विकास’ तथा ‘पर्यावरणीय स्थिरता’ आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। एक ओर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), सड़क परिवहन मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट गाइडलाइंस और दिशा-निर्देश हैं कि नए राजमार्गों के निर्माण में पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए और उन्हें इको-फ्रेंडली बनाने के लिए ‘ग्रीन कॉरिडोर’ का निर्माण शत-प्रतिशत अनिवार्य है। यह केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की नीति का हिस्सा है।

वहीं दूसरी ओर, उन हजारों किसानों, छोटे निवेशकों और कारोबारियों का वैध आर्थिक हित है जिन्होंने अपनी जीवन भर की पूंजी इस क्षेत्र के विकास की उम्मीद में लगाई है। उनका तर्क है कि विकास का लाभ स्थानीय लोगों को भी मिलना चाहिए। कई प्रॉपर्टी कारोबारियों और स्थानीय नेताओं का कहना है कि सरकार और संबंधित विभाग को ग्रीन बेल्ट के लिए भूमि अधिग्रहण के नियमों में पूरी स्पष्टता लानी चाहिए, ताकि जमीन खरीदने या बेचने वालों को पहले से ही यह भली-भांति पता हो कि कहां निर्माण किया जा सकता है और कहां पूरी तरह से रोक है।

निवेशकों द्वारा कुछ व्यावहारिक सुझाव भी दिए जा रहे हैं। उनका कहना है कि प्रशासन को ग्रीन बेल्ट के पीछे स्थित जमीनों तक सुगम पहुंच सुनिश्चित करने के लिए समानांतर ‘सर्विस रोड’ (Service Road) या पर्याप्त ‘एप्रोच मार्ग’ की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। इसके अलावा, कुछ निश्चित दूरी पर ‘व्यवसायिक जोन’ (Commercial Zones) या ‘वे-साइड एमिनिटीज’ (Way-side Amenities) के लिए जगह छोड़ी जानी चाहिए, ताकि उन जमीनों की व्यावसायिक उपयोगिता पूरी तरह से खत्म न हो और सरकार को भी राजस्व का नुकसान न हो।

कैलाश विश्वकर्मा