पुरी (Puri) / धर्म-कर्म (Dharm-Karma): “जय जगन्नाथ!” (Jai Jagannath) ओडिशा (Odisha) के पवित्र शहर पुरी की पावन धरती पर आस्था, भक्ति और श्रद्धा का विश्व प्रसिद्ध महाकुंभ आज से आरंभ हो चुका है। भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र (Balabhadra) और बहन देवी सुभद्रा (Subhadra) के साथ, रत्नवेदी (Ratnavedi) से उतरकर रथवेदी पर आसीन हो चुके हैं। शंख की गूंज, मृदंग की थाप, घंट-घड़ियालों की ध्वनि और लाखों भक्तों के जयकारों से पूरा पुरी शहर गुंजायमान है। यह सिर्फ एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जब स्वयं ब्रह्मांड के नाथ अपने भक्तों से मिलने के लिए मंदिर से बाहर निकलते हैं। जो भक्त मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, भगवान स्वयं उन तक पहुँचते हैं। आज से शुरू हुई यह 9 दिवसीय भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा (Jagannath Rath Yatra) न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है।
रथयात्रा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance of Rath Yatra)
सनातन धर्म में रथयात्रा का अत्यंत विशिष्ट और गहरा महत्व है। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में जगन्नाथ रथयात्रा की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान के रथ की रस्सी को छू भी लेता है, उसे सौ जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। रथयात्रा का यह पावन पर्व आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने श्रीमंदिर से निकलकर अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर (Gundicha Temple) की ओर प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा मानव और ईश्वर के बीच के प्रेम, समर्पण और एकाकार होने का सबसे अनुपम उदाहरण है। यहाँ न कोई राजा होता है न कोई रंक, सभी केवल भगवान के भक्त होते हैं।
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तीन दिव्य रथ और उनमें विराजमान देवी-देवता (The Three Divine Chariots)
जगन्नाथ रथयात्रा में तीन विशाल और भव्य रथों का निर्माण किया जाता है। इन रथों का निर्माण एक विशेष प्रकार की लकड़ी (नीम और फासी) से होता है, जिसे विशेष जंगलों से लाया जाता है। रथों के निर्माण में कील या लोहे का कोई उपयोग नहीं होता, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। रथयात्रा में तीन देवताओं के लिए तीन अलग-अलग रथ होते हैं:
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1. नंदीघोष (Nandighosha): भगवान जगन्नाथ का रथ
भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) जिस रथ पर विराजमान होते हैं, उसे ‘नंदीघोष’ (Nandighosha) या गरुड़ध्वज कहा जाता है। यह रथ तीनों रथों में सबसे बड़ा होता है। इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है और इसमें 16 विशाल पहिए लगे होते हैं। इस रथ का रंग मुख्य रूप से लाल और पीला होता है, जो भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का प्रिय रंग है। इस रथ की रक्षा गरुड़ करते हैं और इसके सारथी का नाम दारुक है। भगवान जगन्नाथ काले रंग के होते हैं और उनकी बड़ी-बड़ी आंखें संपूर्ण ब्रह्मांड को निहारती हुई प्रतीत होती हैं।
2. तालध्वज (Taladhwaja): भगवान बलभद्र का रथ
भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई भगवान बलभद्र (Lord Balabhadra) जिस रथ पर सवार होते हैं, उसे ‘तालध्वज’ (Taladhwaja) कहा जाता है। रथयात्रा में सबसे आगे तालध्वज रथ ही चलता है। इस रथ की ऊंचाई लगभग 44 फीट होती है और इसमें 14 पहिए होते हैं। तालध्वज रथ का रंग लाल और हरा होता है। भगवान बलभद्र के रथ के रक्षक वासुदेव हैं और इसके सारथी मताली हैं। भगवान बलभद्र को शेषनाग का अवतार माना जाता है।
3. दर्पदलन या देवदलन (Darpadalana / Devadalana): देवी सुभद्रा का रथ
भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के बीच में उनकी प्रिय बहन सुभद्रा (Devi Subhadra) का रथ चलता है, जिसे ‘दर्पदलन’, ‘देवदलन’ या पद्म रथ कहा जाता है। यह रथ लगभग 43 फीट ऊंचा होता है और इसमें 12 पहिए होते हैं। इस रथ का रंग लाल और काला होता है। काले रंग को देवी माँ के शक्ति स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। सुभद्रा जी के रथ की रक्षा देवी दुर्गा करती हैं और इसके सारथी का नाम अर्जुन है।
रथयात्रा की सदियों पुरानी परंपराएं और मुख्य अनुष्ठान
रथयात्रा का प्रारंभ कई प्राचीन और पवित्र अनुष्ठानों से होता है, जो भक्तों को भाव-विभोर कर देते हैं। इस यात्रा में कई चरणों का पालन किया जाता है, जिनका विवरण इस प्रकार है:
पहांडी बिजे (Pahandi Bije)
यह वह भावनात्मक क्षण होता है जब तीनों देवी-देवताओं को श्रीमंदिर के गर्भगृह (Garbagriha) से बाहर लाया जाता है। सेवक देवताओं की मूर्तियों को बड़े ही प्रेम और दुलार के साथ झुलाते हुए, धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हैं। इस प्रक्रिया को ‘पहांडी बिजे’ कहते हैं। भगवान का यह स्वरूप देखकर भक्तों के आंसू छलक उठते हैं। घंटियों की आवाज और कीर्तन के बीच भगवान अपने रथों की ओर बढ़ते हैं।
छेरपहरा (Chhera Pahanra): सोने की झाड़ू से रथ की सफाई
रथयात्रा की सबसे प्रमुख और अद्भुत परंपरा है ‘छेरपहरा’। जब तीनों भगवान अपने-अपने रथ पर विराजमान हो जाते हैं, तब पुरी के गजपति महाराज (Gajapati King) पालकी में सवार होकर आते हैं और तीनों रथों के सामने सोने की झाड़ू (Golden Broom) से बुहारी (सफाई) करते हैं और चंदन का छिड़काव करते हैं। यह अनुष्ठान इस बात का प्रतीक है कि भगवान के सामने चाहे कोई राजा हो या प्रजा, सभी एक समान सेवक हैं। अहंकार का त्याग कर ईश्वर की शरण में जाना ही छेरपहरा का मुख्य संदेश है।
रथ खींचने का महापुण्य (Pulling the Chariots)
छेरपहरा के बाद रथ खींचने की प्रक्रिया शुरू होती है। सबसे पहले बलभद्र जी का रथ (तालध्वज), उसके बाद देवी सुभद्रा का रथ (दर्पदलन) और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ (नंदीघोष) खींचा जाता है। लाखों भक्त “हरि बोल” और “जय जगन्नाथ” के गगनभेदी नारों के साथ रथ की मोटी रस्सियों को खींचते हैं। ऐसी मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचने मात्र से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और वह बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।
श्री जगन्नाथ मंदिर: भारत के चार धामों में से एक (Significance of Sri Jagannath Temple)
ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर (Shree Jagannath Temple) हिंदुओं के सबसे पवित्र चार धामों (Char Dham) में से एक है। द्वापर युग के बाद कलियुग में भगवान विष्णु ने जगन्नाथ के रूप में यहाँ निवास किया है। इस मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली (Kalinga Architecture) का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के शिखर पर लगा ‘नीलचक्र’ (Neelachakra) और फहराती हुई ध्वजा (Patitapabana) मीलों दूर से ही भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
श्री जगन्नाथ मंदिर के कई ऐसे रहस्य हैं जिन्हें आज तक विज्ञान भी पूरी तरह से नहीं सुलझा पाया है। मंदिर की ध्वजा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराती है। मंदिर के मुख्य गुंबद की परछाई कभी भी जमीन पर नहीं पड़ती, चाहे सूर्य किसी भी दिशा में हो। मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही समुद्र की लहरों की आवाज़ अचानक से बंद हो जाती है। इसके अतिरिक्त, मंदिर की रसोई (Ananda Bazaar) दुनिया की सबसे बड़ी रसोई मानी जाती है, जहाँ प्रतिदिन लाखों लोगों का महाप्रसाद (Mahaprasad) बनता है और यह महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता। मिट्टी के सात बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर लकड़ी की आग पर पकाया जाने वाला यह प्रसाद सबसे पहले ऊपर वाले बर्तन में ही पकता है, जो किसी चमत्कार से कम नहीं है।
अधूरी मूर्तियों का पौराणिक रहस्य (The Legend of the Incomplete Idols)
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की मूर्तियां नीम की लकड़ी से बनी हैं, जिन्हें ‘दारु ब्रह्म’ (Daru Brahma) कहा जाता है। इन मूर्तियों के हाथ और पैर पूरे नहीं हैं। इसके पीछे की कथा यह है कि जब मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने मंदिर का निर्माण करवाया, तो देवशिल्पी विश्वकर्मा स्वयं एक वृद्ध बढ़ई के रूप में मूर्तियां बनाने आए। उनकी शर्त थी कि 21 दिनों तक वे बंद कमरे में मूर्तियां बनाएंगे और कोई उन्हें परेशान नहीं करेगा। यदि किसी ने दरवाजा खोला, तो वे काम अधूरा छोड़कर चले जाएंगे। जब कई दिनों तक अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई, तो महारानी गुंडिचा के आग्रह पर राजा ने दरवाजा खुलवा दिया। शर्त के अनुसार वृद्ध बढ़ई गायब हो गए और मूर्तियां अधूरी रह गईं। तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में यहाँ पूजे जाना चाहते हैं। तब से भगवान जगन्नाथ इसी रूप में भक्तों को दर्शन दे रहे हैं।
गुंडिचा मंदिर में 9 दिन का प्रवास (9-Day Stay at Gundicha Temple)
रथयात्रा का मुख्य गंतव्य गुंडिचा मंदिर है, जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर कहा जाता है। यह मंदिर मुख्य श्रीमंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रथों पर सवार होकर भगवान जब यहाँ पहुँचते हैं, तो उनका भव्य स्वागत किया जाता है। अगले 9 दिनों तक भगवान इसी मंदिर में निवास करते हैं और यहीं उन्हें ‘आडप अभड़ा’ (Adap Abhada) नामक विशेष महाप्रसाद का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि गुंडिचा मंदिर में भगवान के दर्शन करने से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है।
यात्रा के पांचवें दिन एक बेहद ही रोचक और मनोरंजक परंपरा निभाई जाती है जिसे ‘हेरा पंचमी’ (Hera Panchami) कहा जाता है। माता लक्ष्मी (Goddess Lakshmi) भगवान जगन्नाथ से नाराज हो जाती हैं क्योंकि वे उन्हें साथ लेकर नहीं गए। गुस्से में आकर माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर आती हैं और नंदीघोष रथ का एक हिस्सा तोड़ देती हैं। यह लीला भगवान और भक्त, पति और पत्नी के बीच के मानवीय संबंधों का बड़ा ही मनमोहक चित्रण है।
बहुड़ा यात्रा, सुना बेश और नीलाद्रि बिजे (Bahuda Yatra and Suna Besha)
9 दिनों के प्रवास के बाद, आषाढ़ शुक्ल दशमी को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की वापसी यात्रा शुरू होती है, जिसे ‘बहुड़ा यात्रा’ (Bahuda Yatra) कहा जाता है। वापस आते समय भगवान अपनी मौसी के घर से ‘पोड़ा पीठा’ (Poda Pitha), जो उनका अत्यंत प्रिय मिष्ठान है, का भोग ग्रहण करते हैं।
श्रीमंदिर लौटने के बाद, एकादशी के दिन रथों पर ही भगवान का ‘सुना बेश’ (Suna Besha) होता है। इस दिन तीनों देवी-देवताओं को शुद्ध सोने के भारी और प्राचीन आभूषणों से सजाया जाता है। यह दृश्य अत्यंत विहंगम और दिव्य होता है, जिसे देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ती है। इसके बाद द्वादशी तिथि को ‘अधर पणा’ (Adhara Pana) का भोग लगाया जाता है और अंततः ‘नीलाद्रि बिजे’ (Niladri Bije) के साथ भगवान वापस रत्नसिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेम, समभाव और भक्ति का एक सार्वभौमिक संदेश है। जब जगन्नाथ (जगत के नाथ) अपनी गद्दी छोड़कर सड़क पर उतरते हैं, तो वे यह सिद्ध करते हैं कि ईश्वर की नजर में हर प्राणी समान है। यह 9 दिवसीय रथयात्रा भारतीय संस्कृति और आध्यात्म की उस गहरी जड़ को दर्शाती है, जहाँ धर्म केवल मंदिरों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जन-जन के हृदय में बसता है। आप भी इस पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ का स्मरण करें और उनके श्री चरणों में अपनी प्रार्थना अर्पित करें। “जय जगन्नाथ!”



