मंदसौर में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की मौत पर फूटा गुस्सा: मानसिक प्रताड़ना के आरोप, 25 लाख रुपये मुआवजे और निष्पक्ष जांच की मांग
गांधी चौराहे पर प्रदर्शन करतीं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं

मंदसौर: मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बाद प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है। शहर के बालागंज क्षेत्र में स्थित वार्ड क्रमांक-16 के आंगनवाड़ी केंद्र क्रमांक-3 में पदस्थ 35 वर्षीय कर्मठ कार्यकर्ता **किरण वर्मा** की ड्यूटी के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई। इस घटना ने न सिर्फ किरण के परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है, बल्कि जिले भर की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं में आक्रोश की ज्वाला भड़का दी है।
परिजनों और साथी कार्यकर्ताओं का सीधा और गंभीर आरोप है कि किरण की मौत कोई सामान्य मौत नहीं है, बल्कि यह विभाग की वरिष्ठ अधिकारी (सुपरवाइजर) द्वारा दी जा रही लगातार मानसिक प्रताड़ना और काम के असहनीय दबाव का नतीजा है। इस घटना के बाद से ही मंदसौर में विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया है।
ड्यूटी के दौरान अचानक बिगड़ी तबीयत, अस्पताल में तोड़ा दम
प्राप्त जानकारी के अनुसार, गुरुवार सुबह किरण वर्मा रोज की तरह समय पर अपने केंद्र पहुंची थीं। वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थीं कि अचानक उन्हें चक्कर आया और वे बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ीं। केंद्र में मौजूद सहायिका और आस-पास के लोगों ने आनन-फानन में उन्हें संभाला और तुरंत जिला चिकित्सालय ले जाया गया।
अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उनका परीक्षण किया और उन्हें मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक चिकित्सकीय अनुमान के अनुसार, मौत का कारण ‘साइलेंट हार्ट अटैक’ (Silent Heart Attack) माना जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक तनाव और घबराहट की स्थिति में इस तरह के मामले सामने आते हैं।
सुपरवाइजर पर लगे संगीन आरोप: “छुट्टी मांगने पर मिलती थी नौकरी से निकालने की धमकी”
किरण वर्मा की मौत की खबर फैलते ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सहायिका एकता यूनियन (CITU) से जुड़ी सैकड़ों महिलाएं अस्पताल और फिर सड़क पर उतर आईं। यूनियन की पदाधिकारियों और किरण के साथ काम करने वाली अन्य कार्यकर्ताओं ने सेक्टर सुपरवाइजर **हेमलता सांवलिया** पर उत्पीड़न के बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सुपरवाइजर हेमलता द्वारा किरण को पिछले कई महीनों से मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। किरण अपने वृद्ध और बीमार पिता की सेवा के लिए कभी छुट्टी की मांग करती थीं, तो उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती थी। छोटी-छोटी गलतियों पर सार्वजनिक रूप से अपमानित करना और तय समय से अधिक काम का दबाव बनाना सुपरवाइजर की आदत बन चुकी थी।
किरण ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले अपनी कुछ करीबी सहेलियों से भी इस बात का जिक्र किया था कि वे सुपरवाइजर के व्यवहार से बहुत ज्यादा डिप्रेशन (Depression) में हैं और उन्हें डर सताता है कि कहीं उनकी नौकरी न चली जाए। किरण अपने परिवार की इकलौती कमाऊ सदस्य थीं, इसलिए नौकरी खोने का डर उनके लिए जानलेवा साबित हुआ।
गांधी चौराहे पर लाल झंडों के साथ जोरदार प्रदर्शन
घटना के विरोध में और मृतका को न्याय दिलाने के लिए शुक्रवार को मंदसौर के प्रसिद्ध गांधी चौराहे पर एक विशाल धरना प्रदर्शन आयोजित किया गया। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सहायिका एकता यूनियन के नेतृत्व में सैकड़ों महिलाओं ने हाथों में लाल झंडे और ‘किरण वर्मा को न्याय दो’ की तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया।
प्रदर्शनकारी महिलाओं ने प्रशासन और महिला बाल विकास विभाग (WCD) के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। चौराहे पर कुछ देर के लिए यातायात भी प्रभावित हुआ। महिलाओं का गुस्सा इस बात पर था कि विभाग के अधिकारी इस संवेदनशील मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं और दोषी सुपरवाइजर को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
यूनियन ने रखीं 3 प्रमुख मांगें, कलेक्टर के नाम सौंपा ज्ञापन
प्रदर्शन के बाद यूनियन के एक प्रतिनिधिमंडल ने तहसीलदार को कलेक्टर के नाम एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो पूरे जिले में आंगनवाड़ी केंद्रों पर ताला जड़ दिया जाएगा और अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की जाएगी।
यूनियन की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
- सुपरवाइजर का निलंबन: आरोपी सुपरवाइजर हेमलता सांवलिया को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए और उनके खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने या गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर विभागीय जांच शुरू की जाए।
- 25 लाख रुपये का मुआवजा: मृतका किरण वर्मा के परिवार को कम से कम 25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता (मुआवजा) दी जाए, क्योंकि वे ही अपने वृद्ध पिता का एकमात्र सहारा थीं।
- पिता के भरण-पोषण की गारंटी: किरण के पीछे उनके असहाय पिता अकेले रह गए हैं। शासन-प्रशासन उनके रहने, खाने और इलाज की पूरी जिम्मेदारी उठाए।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़: इकलौती बेटी थी किरण
35 वर्षीय किरण वर्मा ने अभी शादी नहीं की थी। वे अपने वृद्ध पिता के साथ रहती थीं और उन्हीं की देखरेख करती थीं। आंगनवाड़ी से मिलने वाले अल्प मानदेय से ही वे जैसे-तैसे घर का खर्च चला रही थीं और पिता की दवाइयों का इंतजाम करती थीं। किरण की असामयिक मौत ने उनके पिता से न सिर्फ उनकी बेटी छीनी है, बल्कि उनके जीने का सहारा भी छीन लिया है।
पड़ोसियों का कहना है कि किरण एक बेहद हंसमुख और मिलनसार लड़की थी, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से वह बहुत शांत रहने लगी थी। पूछने पर वह कहती थी कि काम का बहुत लोड है और मैडम बहुत परेशान करती हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर बढ़ता दबाव: एक व्यापक समस्या
यह घटना केवल मंदसौर की नहीं है, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश और देश भर में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की स्थिति को बयां करती है। जमीनी स्तर पर सरकार की हर योजना (लाडली बहना, पोषण ट्रैकर, टीकाकरण, कुपोषण निवारण) को लागू करने का जिम्मा इन्हीं कम वेतन भोगी महिला कर्मियों पर होता है।
इन समस्याओं से जूझ रही हैं कार्यकर्ता:
- अल्प मानदेय और अधिक काम: मानदेय के नाम पर इन्हें बहुत कम राशि मिलती है, जबकि काम के घंटे तय नहीं हैं।
- ऑनलाइन काम का बोझ: ‘पोषण ट्रैकर’ जैसे ऐप्स पर रोज डाटा एंट्री करना अनिवार्य कर दिया गया है। कई कार्यकर्ताओं के पास अच्छे स्मार्टफोन या इंटरनेट की सुविधा नहीं होती, जिसके कारण उन्हें अधिकारियों की डांट सुननी पड़ती है।
- अधिकारियों का अमानवीय व्यवहार: जमीनी हकीकत जाने बिना उच्चाधिकारी सिर्फ आंकड़ों की मांग करते हैं और डरा-धमकाकर काम लेते हैं।
प्रशासन का रुख: “मामले की होगी निष्पक्ष जांच”
आक्रोश को देखते हुए प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को शांत कराने का प्रयास किया। तहसीलदार ने आश्वासन दिया है कि किरण वर्मा की मौत के कारणों की विस्तृत जांच कराई जाएगी। सुपरवाइजर के खिलाफ लगाए गए आरोपों की भी जांच होगी और यदि वे दोषी पाई जाती हैं, तो उनके विरुद्ध कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। मुआवजे की फाइल भी जल्द ही शासन को भेजी जाएगी।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन हमेशा किसी अनहोनी के बाद ही जागता है? क्या सरकारी विभागों में काम करने वाली महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य और उनके कार्यस्थल के माहौल को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे? किरण वर्मा की मौत ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब व्यवस्था को देना ही होगा।
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