ट्रांसफर: किसी का सपना, किसी का खौफ – कर्मचारियों के जीवन का एक कड़वा सच

ट्रांसफर: किसी का सपना, किसी का खौफ – सरकारी और प्राइवेट कर्मचारियों के जीवन का एक कड़वा सच

Employee Relocation and Transfer Struggle

सूटकेस में बंद यादें और नए शहर की अनजानी राहें – यही है ट्रांसफर की कहानी

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सरकारी नौकरी हो या प्राइवेट जॉब, ‘ट्रांसफर’ (Transfer) एक ऐसा शब्द है जो किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेर देता है तो किसी की रातों की नींद हराम कर देता है। यह सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाने का सरकारी आदेश नहीं होता, बल्कि यह एक इंसान और उसके पूरे परिवार की जिंदगी को उलट-पुलट कर देने वाला घटनाक्रम होता है।

कहते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है, लेकिन जब यह परिवर्तन किसी ‘स्थानांतरण आदेश’ के रूप में अचानक सामने आता है, तो यह किसी के लिए बरसों पुराना सपना पूरा होने जैसा होता है, तो किसी के लिए एक डरावना खौफ। कोई अपने बूढ़े मां-बाप के पास अपने गांव लौट जाता है और उसकी आंखें खुशी से भर आती हैं, तो कोई अपनी जमी-जमाई गृहस्थी, बच्चों के स्कूल और दोस्तों को छोड़कर किसी अनजान शहर की तरफ भारी मन से कदम बढ़ाता है।

आइए, आज एक इंसानी नजरिए से बात करते हैं उस ‘ट्रांसफर’ की, जो फाइलों में तो सिर्फ एक एंट्री होता है, लेकिन एक कर्मचारी की जिंदगी में भावनाओं का पूरा सैलाब ले आता है।

1. सरकारी कर्मचारियों का दर्द: ट्रांसफर जब बन जाता है ‘सजा’

सरकारी महकमों में ट्रांसफर की एक अपनी ही दुनिया है। यहां नियम तो बहुत हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है। सरकारी कर्मचारियों के लिए ट्रांसफर अक्सर अनिश्चितता का दूसरा नाम होता है।

घर से दूर, अपनों से दूर

एक सरकारी कर्मचारी जब अपनी सेवा शुरू करता है, तो वह जानता है कि उसे कहीं भी भेजा जा सकता है। लेकिन जब उम्र बढ़ती है, जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, तो हर ट्रांसफर एक नई मुसीबत लेकर आता है। मान लीजिए कोई कर्मचारी पिछले 10 साल से किसी एक शहर में है। उसके बच्चे वहां के अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं। अचानक एक दिन आदेश आता है कि आपका ट्रांसफर 500 किलोमीटर दूर किसी ग्रामीण इलाके में कर दिया गया है।

अब उस कर्मचारी के सामने दो ही रास्ते बचते हैं। या तो वह अपनी पत्नी और बच्चों को वहीं छोड़े और खुद अकेले जाकर रहे (जिसे विभागीय भाषा में ‘डबल एस्टेब्लिशमेंट’ कहते हैं, जो जेब पर भारी पड़ता है), या फिर पूरे परिवार को उखाड़कर नए स्थान पर ले जाए। बच्चों का बीच सत्र में स्कूल छुड़ाना उनकी पढ़ाई को बर्बाद कर देता है।

राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार का खेल

यह जगजाहिर है कि सरकारी विभागों में ट्रांसफर-पोस्टिंग एक बड़ा उद्योग बन चुका है। कई बार ईमानदार अधिकारियों को सिर्फ इसलिए ट्रांसफर कर दिया जाता है क्योंकि वे किसी राजनेता या दबंग के गैर-कानूनी काम में अड़ंगा बन रहे होते हैं। इसे ‘लूप लाइन’ में डालना कहा जाता है। ऐसे ट्रांसफर कर्मचारियों का मनोबल तोड़ देते हैं। वे सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि ईमानदारी की कीमत क्या यही है?

बूढ़े माता-पिता की देखभाल

आज के दौर में जब एकल परिवार (Nuclear Family) का चलन बढ़ गया है, सरकारी कर्मचारियों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल की होती है। अगर कर्मचारी का ट्रांसफर किसी ऐसे दूरदराज के इलाके में हो जाए जहां अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं न हों, तो वह अपने बीमार माता-पिता को साथ रखने से भी डरता है। कई कर्मचारी इसी कशमकश में अपनी पूरी जिंदगी होम कर देते हैं।

2. प्राइवेट सेक्टर का ‘रिलोकेशन’: कॉर्पोरेट चमक के पीछे का सच

अक्सर लोग सोचते हैं कि ट्रांसफर की समस्या सिर्फ सरकारी नौकरी वालों के साथ होती है। लेकिन प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कॉर्पोरेट कर्मचारियों का दर्द भी कुछ कम नहीं है। यहां इसे ‘रिलोकेशन’ (Relocation) का फैंसी नाम दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे की मुश्किलें उतनी ही कड़वी होती हैं।

‘परफॉर्म करो या ट्रांसफर लो’

प्राइवेट कंपनियों में ट्रांसफर अक्सर ‘बिजनेस नीड’ (Business Need) के नाम पर किए जाते हैं। कभी-कभी यह कर्मचारी को आगे बढ़ाने के लिए होता है, तो कभी-कभी उसे कंपनी छोड़ने पर मजबूर करने का एक इनडायरेक्ट तरीका (Soft Layoff)। अचानक कह दिया जाता है कि अगले महीने से आपको बेंगलुरु नहीं, बल्कि गुवाहाटी ब्रांच संभालनी है। अगर आप मना करते हैं, तो आपकी ‘लॉयल्टी’ पर सवाल उठने लगते हैं और करियर ग्रोथ रुक जाती है।

महंगाई और लाइफस्टाइल का तालमेल

प्राइवेट जॉब वाले जब एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ा संकट रहने के खर्च (Cost of Living) का होता है। मान लीजिए किसी का ट्रांसफर इंदौर से मुंबई हो गया। कंपनी ने उसकी सैलरी में थोड़ा-बहुत हाइक (Hike) तो कर दिया, लेकिन मुंबई के महंगे घरों का किराया और लाइफस्टाइल उस हाइक को कब निगल जाती है, पता ही नहीं चलता। इंदौर का एक बड़ा सा फ्लैट मुंबई की एक छोटी सी चॉल या वन-बीएचके (1BHK) में तब्दील हो जाता है। यह मानसिक तनाव का बहुत बड़ा कारण बनता है।

वर्किंग कपल्स (Working Couples) की दोहरी मार

आजकल पति और पत्नी दोनों ही काम करते हैं। ऐसे में अगर किसी एक का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो जाए, तो संकट खड़ा हो जाता है। क्या दूसरा पार्टनर अपनी अच्छी-भली नौकरी छोड़ दे? या फिर दोनों अलग-अलग शहरों में रहकर अपनी शादीशुदा जिंदगी को ‘लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप’ (Long Distance Relationship) में बदल दें? प्राइवेट सेक्टर में करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाना किसी सर्कस के खेल से कम नहीं है।

3. जब ट्रांसफर बनता है ‘खुशी का पैगाम’

ऐसा नहीं है कि ट्रांसफर सिर्फ दुख ही लाता है। कई बार यह बरसों की तपस्या का फल होता है।

सोचिए उस फौजी के बारे में जो पिछले तीन साल से सियाचिन की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में देश की सेवा कर रहा था और अब उसका ट्रांसफर उसके गृह राज्य के किसी शांत कैंट इलाके में हो गया है। या उस क्लर्क के बारे में जो अपने बूढ़े और बीमार मां-बाप से दूर रहकर नौकरी कर रहा था और अब उसे अपने ही गृह जिले में पोस्टिंग मिल गई है। उनके लिए यह ट्रांसफर किसी त्यौहार से कम नहीं होता।

प्राइवेट सेक्टर में भी, अगर किसी कर्मचारी को किसी छोटे शहर से दिल्ली, मुंबई या सीधे विदेश (Onsite Opportunity) ट्रांसफर मिलता है, तो यह उसके करियर के लिए एक बड़ा जम्प होता है। उसकी मेहनत सफल हो जाती है।

4. एक मानवीय और व्यावहारिक ट्रांसफर पॉलिसी की जरूरत

ट्रांसफर एम्प्लॉयर (Employer) का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसे लागू करते समय मानवीय दृष्टिकोण (Human Touch) की बहुत जरूरत होती है। रोबोट और इंसान में यही फर्क है।

क्या किया जा सकता है?

  • समय की सूचना: कर्मचारियों को ट्रांसफर की सूचना कम से कम 3-4 महीने पहले दी जानी चाहिए, ताकि वे बच्चों के स्कूल और घर की व्यवस्था कर सकें। बीच सत्र में ट्रांसफर से हर हाल में बचा जाना चाहिए।
  • पारदर्शिता: ट्रांसफर पॉलिसी पूरी तरह से पारदर्शी होनी चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव या राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए।
  • सहानुभूतिपूर्ण विचार: यदि कोई कर्मचारी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, या उसके घर में कोई दिव्यांग बच्चा या बहुत वृद्ध माता-पिता हैं, तो उनके ट्रांसफर पर विशेष सहानुभूति के साथ विचार किया जाना चाहिए।
  • काउंसलिंग और सपोर्ट: कंपनियों और सरकारी विभागों को ट्रांसफर होने वाले कर्मचारियों के लिए रिलोकेशन सपोर्ट और काउंसलिंग की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि वे नए माहौल में आसानी से ढल सकें।

निष्कर्ष

ट्रांसफर सिर्फ एक जगह का बदलना नहीं है, यह एक पूरी जीवनशैली का बदलना है। यह सच है कि ट्रांसफर से प्रशासनिक कसावट आती है और नया अनुभव मिलता है, लेकिन इसके मानवीय पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगली बार जब आप किसी कर्मचारी को अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर किसी नए शहर की ओर जाते देखें, तो समझिएगा कि वह सिर्फ अपना सामान नहीं ले जा रहा, बल्कि अपने पीछे छूट रहे एक छोटे से संसार की यादें और आगे आने वाले अनजाने कल की आशंकाएं भी साथ ले जा रहा है।


कर्मचारियों के हक और उनके जीवन से जुड़ी ऐसी ही संजीदा कहानियों के लिए पढ़ते रहें ‘यशस्वी दुनिया’।


कैलाश विश्वकर्मा