विशेष संपादकीय स्तम्भ | यशस्वी दुनिया: तेज धूप हो या चुभती ठंड, मध्य प्रदेश के किसी भी नेशनल हाईवे या स्टेट हाईवे पर चले जाइए, एक नजारा बहुत आम हो चुका है—सड़क पर रखे पत्थरों का ढेर, जलते हुए टायर, हताश खड़े ड्राइवर और गाड़ियों की कई किलोमीटर लंबी कतारें। कहीं बिजली कटौती से परेशान लोग मुख्य मार्ग पर बैठ जाते हैं, कहीं फसल बीमा या प्राकृतिक आपदा के मुआवजे के लिए किसान चक्का जाम कर देते हैं, तो कहीं सड़क हादसे में किसी की मौत पर शव रखकर प्रदर्शन शुरू हो जाता है। ऐसा लगता है कि अपनी बात सरकार और प्रशासन के कानों तक पहुँचाने का आखिरी और इकलौता तरीका अब सिर्फ सड़क रोकना ही बच गया है।
मगर ज़रा रुककर सोचिए—अपनी वाजिब माँगों को मनवाने की इस होड़ में क्या हम उन बेकसूरों की सुध ले पा रहे हैं, जिनका उस विवाद से रत्तीभर भी वास्ता नहीं होता? अपनी बात मनवाने के लिए किसी दूसरे नागरिक की आजादी और उसकी जिंदगी को पटरियों पर लगा देना कहाँ तक जायज़ है?
पूरे मंदसौर जिले का परिदृश्य: चक्का जाम से लेकर धरना प्रदर्शनों की लहर
यदि हम अकेले मंदसौर जिले के अलग-अलग अंचलों—गरोठ, शामगढ़, सुवासरा, सीतामऊ, भानपुरा से लेकर जिला मुख्यालय तक की स्थिति देखें, तो पिछले कुछ समय में जगह-जगह धरना प्रदर्शन और चक्का जाम के कई मामले सामने आए हैं। कहीं अघोषित बिजली कटौती, कहीं फसल बीमा की लटकी राशि, तो कहीं मुआवजे की मांग को लेकर किसान और ग्रामीण सड़कों पर उतरे हैं।
कई बार ग्रामीण इलाकों में अघोषित बिजली कटौती और फसल बीमा का पैसा न मिलने पर किसानों द्वारा सड़क पर उतरकर विरोध जताया जाता है। हालांकि कई मौकों पर प्रशासनिक अधिकारियों की मुस्तैदी और बातचीत के बाद महज 10 से 15 मिनट में ही जाम खुलवा लिया जाता है और यातायात सुचारु हो जाता है। लेकिन ऐसे छोटे-बड़े प्रदर्शनों से यह सवाल जरूर गहरा जाता है कि क्या हर जनसमस्या के समाधान के लिए सड़क पर उतरना ही पहली मजबूरी बन चुका है?
यह भी पढ़ें (Internal News): शामगढ़ में ख़ौफ़ का अंत: अवैध वसूली और रंगदारी करने वाले 2 आरोपी गिरफ्तार!
फिल्म ‘कागज 2’ का वो दर्द जो हर हिंदुस्तानी की आँखों में आँसू ला दे
सड़क जाम की यह पीड़ा सिर्फ खबरों और बयानों तक सीमित नहीं है। बॉलीवुड की बहुचर्चित फिल्म ‘कागज 2’ (Kaagaz 2) में इस कड़वी हकीकत को जिस शिद्दत से दिखाया गया है, वह किसी का भी कलेजा कँपा दे। स्व. सतीश कौशिक (Satish Kaushik) के अभिनय से सजी इस फिल्म की कहानी एक ऐसे लाचार पिता की दास्तान है, जिसकी होनहार बेटी (जो बड़ी परीक्षा की तैयारी कर रही होती है) एक राजनीतिक रैली और सड़क जाम में एम्बुलेंस फँस जाने के कारण वक्त पर अस्पताल नहीं पहुँच पाती और रास्ते में ही दम तोड़ देती है।
अपनी जवान बेटी को खोने के बाद वह पिता और उनके वकील (अनुपम खेर) कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते हैं। वे अदालत में यह सवाल उठाते हैं कि आखिर रैलियों या भीड़ के चक्का जाम के नाम पर आम इंसान से उसके जीने का अधिकार (Article 21) क्यों छीना जाता है? फिल्म का यह सीन आज हमारी सड़कों की रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई बन चुका है।
जब एम्बुलेंस की सायरन के बीच सड़क पर थम जाती हैं सांसें
ज़रा उस बाप का दर्द सोचिए जो अपनी मासूम बच्ची को गोद में लिए एम्बुलेंस में बैठा है और आगे सड़क पर पत्थरों की दीवार चुन दी गई हो। सोचिए उस छात्र का, जो सालभर की मेहनत के बाद प्रतियोगी परीक्षा देने निकला हो और सड़क जाम के कारण परीक्षा केंद्र का गेट बंद हो जाए। उसका पूरा साल और करियर दांव पर लग जाता है। कोई मजदूर अपनी रोज की दिहाड़ी कमाने निकला है, कोई अपने किसी बीमार रिश्तेदार को देखने पहुँच रहा है—सड़क जाम इन सबकी उम्मीदों पर पानी फेर देता है।
विडंबना देखिए, सड़क पर बैठा किसान या ग्रामीण भी आम आदमी है और जाम में फँसा गाड़ी वाला भी आम आदमी ही है। दोनों अपनी-अपनी मजबूरियों से जूझ रहे हैं।
कानून क्या कहता है और सुप्रीम कोर्ट की नसीहत
संविधान हमें अपनी आवाज उठाने की आजादी देता है, लेकिन यही संविधान दूसरों के स्वतंत्र रूप से चलने-फिरने के हक की सुरक्षा भी करता है। माननीय सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शाहीन बाग मामले में साफ़ कहा था कि सार्वजनिक रास्तों पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा जमाना गैर-कानूनी है। विरोध प्रदर्शन वहीं तक सही है जहाँ से किसी दूसरे के जीवन का अधिकार प्रभावित न हो।
हक की लड़ाई अपनी जगह, पर राह कौन बनाएगा?
दूसरी तरफ यह सच भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि लोग यूँ ही बेवजह सड़कों पर नहीं उतरते। जब हफ़्तों और महीनों तक अफसरों की चौखट घिसने के बाद भी जनसमस्याओं का समाधान नहीं होता, जब फसल बीमा या प्राकृतिक आपदा के मुआवजे की फाइलें दफ्तरों की धूल फाँकती रहती हैं, तब लोगों का भरोसा टूटता है। उन्हें लगता है कि जब तक पहिए नहीं रोकेंगे, तब तक साहब लोग उनकी फरियाद नहीं सुनेंगे।
मध्य प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अफसरों को सबसे पहले अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। अगर बिजली की किल्लत, फसल बीमा या स्थानीय समस्याओं का निपटारा वक्त पर बिना सिफारिश के होने लगे, तो किसी भी किसान या नागरिक को तपती सड़क पर दरी बिछाकर बैठने का शौक नहीं है।
यह भी पढ़ें (Internal News): सावन में महाकाल के श्रद्धालुओं के लिए उज्जैन-भोपाल के बीच 3 जोड़ी मेला स्पेशल ट्रेनें!
इसके साथ ही मंदसौर सहित हर जिले और नगर में दिल्ली के जंतर-मंतर की तरह एक सम्मानजनक ‘निर्धारित धरना स्थल’ तय किया जाना चाहिए, जहाँ मीडिया भी पहुँचे और जिम्मेदार अधिकारी भी। साथ ही, किसी भी विरोध प्रदर्शन के दौरान एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और परीक्षार्थियों के लिए एक ‘इमरजेंसी लेन’ हमेशा खुली रखने की परंपरा शुरू होनी चाहिए।
लोकतंत्र में अपनी माँग रखना हमारा अधिकार है, लेकिन यह अधिकार किसी दूसरे की जिंदगी से बड़ा नहीं हो सकता। समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन, किसान संगठन और आम समाज मिलकर एक ऐसा रास्ता निकालें जहाँ जनता का दर्द भी सुना जाए और सड़कें भी चलती रहें।


