ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ: कैसे भारत ने तोड़ी पाक-चीन-तुर्किये की तिकड़ी की कमर

ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ: पाक-चीन-तुर्किये के 900 ड्रोन हमलों को भारत ने कैसे किया नाकाम, जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी

Operation Sindoor Drone Attack

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन हमलों को नाकाम करता भारतीय एयर डिफेंस (प्रतीकात्मक चित्र)

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नई दिल्ली: भारत के सैन्य इतिहास में ७-८ मई २०२५ की रात एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसने आधुनिक युद्ध (Modern Warfare) की दिशा बदल दी। इसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (Operation Sindoor) के नाम से जाना जाता है। आज इस ऐतिहासिक सैन्य अभियान की पहली वर्षगांठ है। यह वह समय था जब भारत ने न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा की, बल्कि दुश्मन को उसके घर में घुसकर ऐसा सबक सिखाया जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे।

यह कहानी है उस अभूतपूर्व ड्रोन हमले की, जिसे पाकिस्तान ने चीन और तुर्किये की मदद से अंजाम देने की कोशिश की थी, और कैसे भारतीय सेना और वायुसेना ने मिलकर इस ‘तिकड़ी’ के मंसूबों पर पानी फेर दिया।

एक रात में 900 से अधिक ड्रोन का हमला

७ मई २०२५ की रात को पाकिस्तान की ओर से भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर एक साथ हमला बोला गया। यह कोई सामान्य हमला नहीं था। यह इतिहास का सबसे बड़ा ड्रोन हमला (Massive Drone Attack) था। गुजरात के कच्छ से लेकर जम्मू-कश्मीर के बर्फीले पहाड़ों तक, लगभग ३६ अलग-अलग ठिकानों को निशाना बनाया गया था।

खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, उस रात दुश्मनों ने लगभग ९०० से १००० ड्रोन्स का इस्तेमाल किया था। इन ड्रोन्स को चीन और तुर्किये की अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया गया था। इनका मकसद भारत के महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों, रडार सिस्टम और नागरिक इलाकों को भारी नुकसान पहुंचाना था।

Operation Sindoor Infographic

गुजरात से कश्मीर तक फैला रक्षा कवच (प्रतीकात्मक चित्र)

आर्थिक युद्ध और नेटवर्क एक्सपोजर की थी साजिश

विशेषज्ञों के अनुसार, इस हमले के पीछे दुश्मन की एक बहुत ही शातिर और गहरी साजिश थी। इसके मुख्य रूप से चार बड़े मकसद थे:

  • आर्थिक रूप से कमजोर करना (Economic Warfare): दुश्मन की योजना थी कि भारत अपने महंगे एयर डिफेंस मिसाइलों (जिनकी कीमत करोड़ों में होती है) का इस्तेमाल इन सस्ते ड्रोन्स (जिनकी कीमत कुछ हजारों में होती है) को गिराने के लिए करे। इससे भारत को भारी आर्थिक नुकसान होता।
  • रडार नेटवर्क को उजागर करना: इतने बड़े पैमाने पर ड्रोन भेजकर दुश्मन भारत के रडार और सर्विलांस नेटवर्क की क्षमता और उनकी लोकेशन को ट्रैक करना चाहता था।
  • हवाई सुरक्षा को भेदना: वे देखना चाहते थे कि क्या भारत का एयर डिफेंस सिस्टम इतने बड़े ‘क्लट’ (एक साथ कई टारगेट) को संभाल सकता है या नहीं।

भारत का अचूक जवाब: 98% ड्रोन हवा में ही तबाह

लेकिन दुश्मन यह भूल गया था कि वे २१वीं सदी के नए भारत से टकरा रहे थे। जैसे ही ड्रोन्स ने भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश किया, भारत का ‘इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम’ (IACCS) पूरी तरह सक्रिय हो गया। यह भारत की ‘नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर’ क्षमता का असली इम्तिहान था।

भारतीय सेना और वायुसेना ने स्वदेशी और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम का उपयोग करते हुए उन ९०० से अधिक ड्रोन्स में से **९८% को हवा में ही मार गिराया**। यह एक ऐसा रिकॉर्ड था जिसने दुनिया भर के सैन्य विशेषज्ञों को हैरान कर दिया। दुश्मन की आर्थिक चोट पहुंचाने की योजना धरी की धरी रह गई क्योंकि भारत ने लागत प्रभावी (Cost-Effective) तरीकों से इन्हें ढेर किया।

23 मिनट का वो ‘रिटालिएशन’ जिसने पाकिस्तान को हिला दिया

भारत केवल बचाव करने तक सीमित नहीं रहा। जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि यह एक बड़ा सुनियोजित हमला था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई और तुरंत जवाबी कार्रवाई (Retaliatory Strike) का आदेश दिया गया।

भारतीय वायुसेना के जांबाज पायलटों ने केवल २३ मिनट के अंदर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) और पाकिस्तान के अंदर स्थित **९ बड़े आतंकी कैंपों** को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया। इस सर्जिकल और प्रिसिजन स्ट्राइक में १०० से अधिक खूंखार आतंकवादी और उन्हें कवर दे रहे लगभग १०० पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे।

नाम ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ही क्यों?

इस पूरे सैन्य अभियान को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम खुद प्रधानमंत्री मोदी ने दिया था। इसके पीछे एक बेहद भावुक और कड़ा संदेश था। कुछ समय पहले पहलगाम में हुए आतंकी हमले में कई निर्दोष लोगों की जान गई थी, जिससे कई महिलाओं का सुहाग उजड़ गया था। उन महिलाओं के बलिदान और सम्मान में, और आतंकवादियों के सिंदूर (खून) से होली खेलने के मंसूबों को खत्म करने के लिए इस ऑपरेशन को यह नाम दिया गया।

आधुनिक युद्ध कला में भारत का लोहा

ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया कि भारत अब केवल पारंपरिक युद्ध ही नहीं, बल्कि ड्रोन वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी दुनिया के किसी भी देश से पीछे नहीं है। चीन और तुर्किये जैसी महाशक्तियों की तकनीक भी भारतीय शौर्य और स्वदेशी तकनीक के आगे फेल साबित हुई।

आज इस अभियान के एक साल पूरे होने पर पूरा देश अपनी सेना के उन जांबाज जवानों और इंजीनियरों को नमन कर रहा है, जिन्होंने उस रात जागकर देश की सुरक्षा सुनिश्चित की थी।


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कैलाश विश्वकर्मा