आगर मालवा/झालावाड़। राजस्थान के झालावाड़ जिले के चौमहला न्यायालय द्वारा जारी एक आदेश की प्रति सामने आने के बाद आगर मालवा पुलिस की एक कथित कार्रवाई गंभीर कानूनी विवादों में घिर गई है। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया गंभीर तथ्यों और तकनीकी साक्ष्यों को आधार मानते हुए तत्कालीन आगर कोतवाली थाना प्रभारी शशि उपाध्याय (TI Shashi Upadhyay) सहित करीब 100 पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज करने का बड़ा आदेश जारी किया है। इस आदेश के बाद मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों राज्यों के पुलिस महकमों में हड़कंप मच गया है, और विवादित एनडीपीएस (NDPS) कार्रवाई की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

तत्कालीन आगर कोतवाली थाना प्रभारी शशि उपाध्याय
तस्वीर: तत्कालीन आगर कोतवाली थाना प्रभारी शशि उपाध्याय (Shashi Upadhyay)

घाटाखेड़ी में की गई NDPS कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

यह पूरा कानूनी मामला आगर मालवा पुलिस थाना के प्रकरण क्रमांक 32/2026 से जुड़ा हुआ है। इस प्रकरण में पुलिस ने दावा किया था कि उन्होंने राजस्थान के डग थाना क्षेत्र में स्थित ग्राम घाटाखेड़ी में दबिश देकर गुलिस्तान शाहिद एवं मुन्नवर को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि आरोपियों के पास से धारा 8/22 NDPS Act के तहत भारी मात्रा में मादक पदार्थ और ड्रग्स निर्माण सामग्री जब्त की गई थी। पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 (संशोधित 23(2)) के तहत मिली सूचना के आधार पर की गई थी।

Advertisement

लेकिन इस कथित कार्रवाई के खिलाफ परिवादी हमीद खान ने चौमहला न्यायालय में गुहार लगाई थी। परिवादी का आरोप था कि आगर कोतवाली पुलिस ने पूरी तरह से झूठी, मनगढ़ंत और नियम विरुद्ध कार्रवाई की थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि मध्य प्रदेश पुलिस बिना स्थानीय राजस्थान पुलिस को पूर्व सूचना दिए ग्राम घाटाखेड़ी में घुसी, घर में तोड़फोड़ की, महिलाओं के साथ अभद्रता की और बाद में एक झूठा मादक पदार्थ जब्ती का मामला तैयार कर दिया।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की जांच में कई विरोधाभास उजागर

चौमहला न्यायालय के आदेश के बाद झालावाड़ पुलिस अधीक्षक (SP) के निर्देश पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) भागचन्द्र मीणा ने मामले की विस्तृत जांच की। इस जांच रिपोर्ट में पुलिस के दावों के विपरीत कई गंभीर विरोधाभास सामने आए:

  • अभिलेखों में विसंगति: पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जिन सामग्रियों की जब्ती का बड़ा दावा किया था, उनमें से कई सामग्रियां जब्ती दस्तावेजों (Seizure List) में दर्ज ही नहीं पाई गईं।
  • दस्तावेजों और सबूतों का गायब होना: पुलिस ने दावा किया था कि जब्ती और गिरफ्तारी की पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफी की गई थी, लेकिन जांच दल को उसका कोई प्रामाणिक रिकॉर्ड या फुटेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका। तलाशी और जब्ती प्रक्रिया से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज भी गायब मिले।
  • समय का बड़ा अंतर: सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी साक्ष्य सीसीटीवी (CCTV) फुटेज से मिला। फुटेज और तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, मध्य प्रदेश पुलिस के वाहन ग्राम घाटाखेड़ी में दोपहर 04:19 बजे से शाम 04:49 बजे तक ही मौजूद थे, जबकि पुलिस ने कागजी रिकॉर्ड में मादक पदार्थ जब्ती का समय शाम 05:40 बजे दर्शाया था। समय के इस करीब एक घंटे के अंतर को लेकर कोर्ट में गंभीर आपत्ति उठाई गई।

न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि स्थानीय पुलिस को बिना सूचना दिए की गई यह कार्रवाई अत्यंत संदिग्ध है। स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति और वीडियोग्राफी न होने के कारण यह कार्रवाई पूरी तरह से अविश्वसनीय प्रतीत होती है, इसलिए प्रथम दृष्टया गहन जांच आवश्यक है। अदालती नियमों और विधिक प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए आप डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स ऑफ राजस्थान (District Courts of Rajasthan) की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं।

बड़ोद थाना प्रभारी रूप सिंह बैस सहित अन्य पुलिसकर्मियों की भूमिका

इस विवादित कार्रवाई में केवल आगर कोतवाली पुलिस ही नहीं, बल्कि बड़ोद थाना पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। तत्कालीन बड़ोद थाना प्रभारी रूप सिंह बैस (Rup Singh Bais) सहित कई अन्य पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी न्यायालय के इस आदेश के तहत जांच और कार्रवाई की आंच पहुंच सकती है। मामला दर्ज होने के बाद स्थानीय स्तर पर भी हड़कंप मचा हुआ है।

तत्कालीन बड़ोद थाना प्रभारी रूप सिंह बैस
तस्वीर: तत्कालीन बड़ोद थाना प्रभारी रूप सिंह बैस (Rup Singh Bais)

विवादों से पुराना नाता रहा है थाना प्रभारी शशि उपाध्याय का

इस अदालती आदेश के बाद तत्कालीन कोतवाली थाना प्रभारी शशि उपाध्याय की कार्यशैली और व्यवहार को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। स्थानीय लोगों और मीडियाकर्मियों का आरोप है कि थाना प्रभारी का रवैया हमेशा से तानाशाही रहा है। वे अक्सर पत्रकारों को कोर्ट घसीटने की धमकियां देती थीं। इसके अलावा, संवेदनशील मामलों में समय पर जानकारी साझा न करने और मीडिया व जनता के फोन रिसीव न करने की शिकायतें भी लंबे समय से सामने आ रही थीं।

आगर मालवा क्षेत्र में पुलिस द्वारा की जाने वाली अन्य मादक पदार्थ विरोधी कार्रवाईयों जैसे पूर्व में हुई आगर मालवा पुलिस डोडाचूरा जब्ती की रिपोर्ट तथा मंदसौर क्षेत्र की प्रमुख पुलिस कार्रवाईयों जैसे भावगढ़ पुलिस कर्मियों का निलंबन की विस्तृत खबरों को भी आप हमारी वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं। पुलिस विभाग के नियमों और दिशा-निर्देशों की जानकारी के लिए आप मध्य प्रदेश पुलिस की वेबसाइट एमपी पुलिस (MP Police) तथा राजस्थान पुलिस के नियमों के लिए राजस्थान पुलिस (Rajasthan Police) के आधिकारिक वेब पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।

चौमहला कोर्ट के इस कड़े फैसले के बाद अब मध्य प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह विभाग इस मामले में क्या विभागीय कार्रवाई करते हैं। कानून की सर्वोच्चता और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों के विवरण के लिए आप सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (Supreme Court of India) की वेबसाइट का संदर्भ ले सकते हैं।


विशेष कानूनी रिपोर्ट: कैलाश विश्वकर्मा (संपादक, यशस्वी दुनिया)

कैलाश विश्वकर्मा