साहित्य | विशेष प्रेम कहानी: दिसंबर की वह सुबह जैसे कोहरे की मोटी चादर में लिपटी हुई थी। स्टेशन की पीली बत्तियों की रोशनी भी धुंध को चीर नहीं पा रही थी। हर तरफ एक अजीब-सी सिहरन थी, लेकिन विजय के सीने के भीतर एक अजीब-सी गरमाहट तैर रही थी। उसके हाथों में गत्ते का एक छोटा-सा डिब्बा था, जिसे उसने अपनी पुरानी जैकेट से ढँक रखा था ताकि बाहर की बर्फीली हवा अंदर की गर्माहट को न चुरा ले। उस डिब्बे में कोई बेशकीमती जवाहरात नहीं थे, बस चार ताज़ा रसमलाई थी। मगर विजय के लिए उन चार रसमलाइयों की कीमत किसी सल्तनत के ख़ज़ाने से भी बड़ी थी।
पिछले कई महीनों से जब भी फोन पर सुमन की हँसी गूँजती, वह हर बार बातों ही बातों में लाड़ से कह देती— “सुनो, इस बार जब मिलने शहर आओगे, तो मेरे लिए मेरी मनपसंद रसमलाई ज़रूर लाना, वरना स्टेशन के बाहर से ही वापस लौट जाना!”
विजय हर बार फोन के इस पार मुस्कुरा देता, लेकिन फोन कटते ही अपनी खाली जेब देखकर उसका मन बैठ जाता। बेरोज़गारी की मार झेल रहे एक आम हिंदुस्तानी लड़के के लिए दो वक्त का सादा खाना ही बहुत बड़ी चुनौती था; ऐसे में किसी ब्रांडेड दुकान से दो सौ रुपये की मिठाई खरीदना उसकी हैसियत से बाहर था। वह हर बार शर्मिंदगी का घूँट पीकर रह जाता।
सपनों की पहली उड़ान और वो पहली तनख़्वाह
लेकिन सब दिन एक से नहीं रहते। कड़ी मशक्कत के बाद शहर की एक कपड़ा मिल में विजय को छोटी-सी नौकरी मिल गई। जब महीने के आखिर में अकाउंटेंट ने कड़कड़ाते नोट उसके हाथ में थमाए, तो विजय की आँखों के सामने सबसे पहला चेहरा सुमन का उभरा। उसने बिना एक पल गँवाए मिल के बाहर से सीधे हलवाई की दुकान का रुख किया। मिट्टी की सोंधी खुशबू और केसरिया चाशनी में डूबी ताज़ी रसमलाई का डिब्बा जब उसने अपने हाथ में लिया, तो लगा जैसे उसकी बरसों की मुफ़लिसी का जवाब उसे मिल गया हो।
उसने तुरंत सुमन को फोन किया— “तैयार रहना, आज दोपहर तुमसे मिलने आ रहा हूँ!”
दूसरी तरफ सुमन की खनकती हुई आवाज़ आई— “याद है न मेरी शर्त? ख़ाली हाथ आए तो स्टेशन से ही भगा दूँगी!”
विजय खिलखिला पड़ा। दोनों का प्यार कोई बड़ी-बड़ी गाड़ियों या महँगे होटलों का मोहताज नहीं था। स्टेशन की किसी सूनी बेंच पर बैठकर एक ही डिब्बे से मिठाई बाँटकर खा लेना ही उनकी दुनिया थी।
एक चूक… और बदल गया रास्ते का मंज़र
डिब्बे को बड़े जतन से सँभाले विजय दौड़ते हुए रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म नंबर दो पर पहुँचा। धुंध इतनी घनी थी कि दूर लगे इंडिकेटर बोर्ड का नंबर साफ़ नहीं दिख रहा था। ठीक उसी वक्त सामने एक एक्सप्रेस ट्रेन आकर रुकी। विजय को लगा कि यह वही लोकल मेल है, जिसमें वह हमेशा सफर करता था। उसने बिना ट्रेन का नाम पढ़े, जल्दबाजी में पैर डिब्बे के पायदान पर टिका दिए।
ट्रेन चल पड़ी। सीट पर बैठकर जब उसने गहरी साँस ली, तो उसे लगा कि बस अब तीन घंटे बाद सुमन उसके सामने होगी। लेकिन धीरे-धीरे ट्रेन की रफ़्तार ऐसी बढ़ी कि छोटे-छोटे स्टेशन हवा की तरह पीछे छूटने लगे। पहला हॉल्ट निकल गया, ट्रेन नहीं रुकी। दूसरा स्टेशन भी बिना सीटी बजाए पीछे छूट गया।
विजय के माथे पर पसीना छलक आया। उसने सामने बैठे अधेड़ सहयात्री से घबराते हुए पूछा— “भैया, यह ट्रेन अपने शहर वाले छोटे स्टेशन पर कब रुकेगी?”
यात्री ने हमदर्दी से उसे देखा और सिर हिलाते हुए बोला— “अरे बाबूजी! आप गलत ट्रेन में चढ़ गए हैं। यह तो नॉन-स्टॉप बनारस सुपरफ़ास्ट है। अब यह सीधे चार घंटे बाद बड़े जंक्शन पर ही ब्रेक मारेगी।”
यह सुनते ही जैसे विजय के दिमाग में सन्नाटा छा गया। ट्रेन का वो टाइमिंग क्लैश… और उसकी हड़बड़ाहट! उसकी अपनी लोकल ट्रेन तो आधे घंटे बाद आने वाली थी। उसने तुरंत काँपते हाथों से मोबाइल निकाला और सुमन का नंबर मिलाया।
“सुमन… मैं बहुत बड़ी बेवकूफी कर बैठा। गलत ट्रेन में चढ़ गया हूँ। आज हमारा मिलना शायद नहीं हो पाएगा…” उसकी आवाज़ रूँध गई थी।
दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड का भारी सन्नाटा रहा। फिर सुमन ने अपनी उदासी को छुपाते हुए धीरे से कहा— “कोई बात नहीं विजय… परेशान मत हो। अपना ध्यान रखना, फिर कभी मिल लेंगे।”
लेकिन विजय जानता था कि उस शांत आवाज़ के पीछे कितना गहरा इंतज़ार टूटकर बिखरा था।
सर्द ट्रैक पर 17 किलोमीटर का अटूट इम्तिहान
विजय अपनी जगह पर शांत नहीं बैठ सका। जब ट्रेन मेरठ से काफ़ी पहले आउटर सिग्नल पर धीमी हुई, तो उसके भीतर का प्रेमी जाग उठा। उसने चलती ट्रेन से कूदने का प्रयास किया, लेकिन पास खड़े मुसाफ़िरों ने उसे ज़बरदस्ती पकड़ लिया— “पागल हो गए हो क्या लड़के? जान चली जाएगी!”
जैसे ही ट्रेन आउटर पर रुकी, विजय बैग और रसमलाई का डिब्बा लेकर नीचे कूद पड़ा। किसी स्थानीय व्यक्ति ने कहा था कि यहाँ से मुख्य स्टेशन कोई सात किलोमीटर की दूरी पर है। विजय ने सोचा कि पटरियों के किनारे-किनारे पैदल चलकर वह दो घंटे में पहुँच जाएगा। रास्ते में कोई लिफ्ट या साधन मिल ही जाएगा।
लेकिन हकीकत बहुत दर्दनाक थी। जिसे उसने 7 किलोमीटर सुना था, वह असल में पूरे 17 किलोमीटर का बीहड़ और लंबा पटरियों का जाल था!
दिसंबर की चुभती हवाएँ चेहरे को छील रही थीं। पैरों में पतले जूते थे, जो गिट्टियों की मार से फटने लगे थे। एक घंटा बीत गया, दो घंटे बीत गए… दूर-दूर तक स्टेशन का कोई नामोनिशान नहीं था। पैर के छालों से खून रिसने लगा था, घुटने जवाब दे रहे थे। लेकिन विजय के एक हाथ में वह मिठाई का डिब्बा सीने से चिपका हुआ था, जैसे किसी सिपाही का तिरंगा हो। उसकी आँखों के सामने सिर्फ़ सुमन का वह इंतज़ार करता हुआ चेहरा घूम रहा था।
“मुझे पहुँचना होगा… सुमन मेरा इंतज़ार कर रही है।”— यही एक वाक्य उसकी उखड़ती साँसों को ईंधन दे रहा था।
इंतज़ार, आँसू और रसमलाई का सच्चा स्वाद
लगभग सवा तीन घंटे की अंतहीन पैदल यात्रा के बाद जब धुंध के बीच मेरठ स्टेशन का बड़ा बोर्ड और पीली लाइटें चमकीं, तो विजय का शरीर पूरी तरह टूट चुका था। वह लँगड़ाते हुए प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा।
सामने प्लेटफ़ॉर्म नंबर एक की उसी पुरानी लोहे की बेंच पर सुमन बैठी थी—ठंड में सिमटी हुई, अपनी उँगलियाँ मलती हुई, आँखें पटरियों की तरफ़ टिकाए। उसे यक़ीन था कि उसका विजय ज़रूर आएगा।
विजय की आँखों से आँसू बह निकले। वह धीरे-धीरे काँपते कदमों से उसके पास पहुँचा। उसके कपड़े धूल से सने थे, चेहरा ठिठुर कर पीला पड़ चुका था। उसने काँपते हाथों से वह रसमलाई का डिब्बा सुमन की तरफ़ बढ़ा दिया। उसकी आवाज़ गले में ही अटक रही थी— “देखो… तुम्हारी रसमलाई… खराब नहीं होने दी मैंने…”
सुमन ने उठकर विजय के थके हुए चेहरे को देखा, फिर उसकी फटी हुई जूतियों और छालों से भरे पैरों को। उसकी अपनी आँखें छलक आईं। उसने डिब्बा थामते हुए विजय का हाथ अपने हाथों में ले लिया।
“दुनिया में कोई मिठाई इतनी मीठी नहीं हो सकती विजय… इसकी मिठास इस रसमलाई में नहीं, तुम्हारे इस 17 किलोमीटर के सफ़र, तुम्हारे इस तपस्या और तुम्हारे निश्छल प्रेम में है।”
उसी सर्द शाम, प्लेटफ़ॉर्म की उस बेंच पर बैठकर दोनों ने एक-दूसरे को रसमलाई खिलाई। उस दिन रसमलाई सिर्फ़ एक साधारण मिठाई नहीं रही, वह दो दिलों के अटूट समर्पण, त्याग और अमर प्रेम का प्रतीक बन गई।
आज बरसों बाद भी जब भी विजय किसी दुकान पर रसमलाई देखता है, उसकी रूह में वह दिसंबर की सर्द हवा, पटरियों का सन्नाटा और स्टेशन की बेंच पर इंतज़ार करती सुमन की वो नम आँखें ताज़ा हो जाती हैं। सच ही तो है—प्रेम महँगे तोहफ़ों का मोहताज नहीं होता, प्रेम तो उस जज़्बे का नाम है जो 17 किलोमीटर के तूफ़ान को भी एक मुस्कान में बदल दे।

