✍️ हास्य-व्यंग्य संपादकीय: कैलाश विश्वकर्मा
संपादक, यशस्वी दुनिया साप्ताहिक
यह लेख एक विशुद्ध हास्य-व्यंग्य (Satire/Comedy) है। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संगठन, प्रशासन या आंदोलनकारी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या किसी का मन दुखाना कतई नहीं है। इसे केवल एक सामाजिक विसंगति पर कटाक्ष और स्वस्थ हास्य-व्यंग्य के नजरिए से ही पढ़ा व समझा जाए।
पंचलाइन: कहीं ऐसा न हो कि ‘हम दो, हमारे दो’ के बाद देश का नया नारा बन जाए—‘हम दो, हमारे दो और तीसरा धरना दो!’
देश में विकास की रफ्तार चाहे जितनी तेज हो, महंगाई के आंकड़े चाहे जितने ऊपर-नीचे होते रहें, बेरोजगारी की समस्या कितनी भी गंभीर हो और सरकारी दफ्तरों में किसी फाइल को एक टेबल से दूसरी टेबल तक पहुंचने में कितने ही दिन क्यों न लग जाएं, लेकिन एक काम ऐसा है जिसमें हमारा देश लगातार तरक्की कर रहा है। वह है धरना-प्रदर्शन, आंदोलन, हड़ताल और सड़क पर बैठकर अपनी मांगें मनवाने की कला! देश में कोई दिन ऐसा गुजर जाए, जब कहीं न कहीं किसी मांग को लेकर प्रदर्शन न हो, तो लगता है जैसे कैलेंडर में से कोई जरूरी त्योहार ही गायब हो गया हो।
सुबह अखबार खोलिए तो कहीं किसान आंदोलन कर रहे हैं, कहीं कर्मचारी अपनी तनख्वाह बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, कहीं बीमा राशि नहीं मिलने से लोग परेशान हैं, कहीं फसल मुआवजे के लिए किसान सड़क पर बैठे हैं, तो कहीं न्याय की आस में लोग धरना दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि देश की सड़कों ने अब वाहनों से ज्यादा आंदोलनों का भार उठाने की जिम्मेदारी संभाल ली है।
भविष्य की कल्पना: ‘राष्ट्रीय धरना एवं आंदोलन प्रशिक्षण संस्थान’
अब जरा भविष्य की कल्पना कीजिए। अगर धरना-प्रदर्शन का यही सिलसिला चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब देश में इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज और मैनेजमेंट संस्थानों की तर्ज पर बाकायदा ‘राष्ट्रीय धरना एवं आंदोलन प्रशिक्षण संस्थान’ खुलने लगेंगे। यहां प्रवेश के लिए ऑनलाइन आवेदन होंगे, एंट्रेंस एग्जाम होगा, मेरिट लिस्ट निकलेगी और फिर शुरू होगा आंदोलनकारी बनने का पक्का प्रशिक्षण।
कोर्स के नाम भी बड़े जानदार होंगे—
- डिप्लोमा इन धरना मैनेजमेंट (Diploma in Dharna Management)
- मास्टर ऑफ प्रोटेस्ट साइंस (Master of Protest Science)
- पीएचडी इन अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल (Ph.D. in Hunger Strike)
प्रवेश लेने वाले छात्रों को पहले दिन ही सिखाया जाएगा कि धरना देना केवल जमीन पर बैठ जाने का नाम नहीं है। यह एक संपूर्ण कला है, जिसमें धैर्य, अनुशासन, नारेबाजी, भाषणबाजी और कैमरे के सामने सही समय पर सही मुद्रा बनाने का विशेष महत्व है। विद्यार्थियों को बताया जाएगा कि धरना शुरू करने से पहले मांगों की सूची तैयार करना जितना जरूरी है, मांगें पूरी होने के बाद धरना समेटना उससे भी ज्यादा पेचीदा काम है। इसलिए बाकायदा ‘धरना शुरू करने और समाप्त करने की उन्नत तकनीक’ नाम का एक अलग विषय पढ़ाया जाएगा।
नारा विशेषज्ञ फैकल्टी और 5 मिनट की रैपिड परीक्षा
इस संस्थान में नारे गढ़ने के लिए अलग से प्रोफेसर नियुक्त किए जाएंगे। उनका काम होगा विद्यार्थियों को ऐसे नारे सिखाना, जो छोटे हों, जोरदार हों और टीवी की हेडलाइन में आसानी से फिट हो जाएं। मसलन, ‘मांग हमारी पूरी करो, नहीं तो कुर्सी खाली करो’, ‘जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक लड़ाई जारी रहेगी।’ यदि किसी आंदोलन में नारे ठंडे पड़ने लगें, तो विशेषज्ञ शिक्षक मौके पर पहुंचकर उनमें नई जान फूंकेंगे।
परीक्षा में छात्रों को एक विषय मिलेगा और पांच मिनट के भीतर दस आकर्षक नारे तैयार करने होंगे। जो छात्र सबसे ज्यादा असरदार नारे बनाएगा, उसे ‘सर्वश्रेष्ठ नारा निर्माता’ का गोल्ड मेडल मिलेगा।
साथ ही, एक खास क्लास होगी ‘मीडिया मैनेजमेंट एवं कैमरा दर्शन’ की। छात्रों को सिखाया जाएगा कि अपनी बात स्पष्ट, पुरअसर और तथ्यात्मक ढंग से कैसे रखी जाए। कैमरे के सामने बोलते समय शब्दों का चयन ऐसा हो कि मुद्दा भी चमके और बात का बतंगड़ भी न बने। प्रोफेसर मुस्कराकर कहेंगे—“बेटा, यह आधुनिक दौर है। आंदोलन में मुद्दा जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि लोगों तक मुद्दा सही तरीके से पहुंचे।”
‘हर घर आंदोलनकारी योजना’ और ऑनलाइन धरना बुकिंग
अब जरा आंदोलनकारी परिवार योजना की कल्पना कीजिए। कहीं सरकार एक नई योजना न ले आए—‘हर घर आंदोलनकारी योजना’! इसके तहत हर परिवार से एक सदस्य चुना जाएगा, जो जीवनभर जनता की समस्याओं के लिए धरना देने का काम करेगा। परिवार का एक सदस्य नौकरी करेगा, दूसरा घर संभालेगा, तीसरा बच्चों को पढ़ाएगा और चौथा पूरी निष्ठा से आंदोलन संभालेगा।
उसके लिए बकायदा सरकारी पहचान पत्र जारी होगा। कार्ड पर लिखा होगा—‘मान्यता प्राप्त पूर्णकालिक आंदोलनकारी’। सरकारी किट में मिलेगी—एक दरी, एक छाता, पानी की बोतल, प्राथमिक उपचार किट और मांगों का रजिस्टर।
सरकार एक ऑनलाइन पोर्टल भी बना देगी—’ई-धरना पोर्टल’, जहाँ लोग अपनी जरूरत के हिसाब से धरना बुक कर सकेंगे। फसल मुआवजा चाहिए? कृषि विभाग के सामने स्लॉट बुक कीजिए। बीमा राशि नहीं मिली? बीमा कंपनी के गेट का स्लॉट चुनिए। वेतन वृद्धि चाहिए? संबंधित विभाग के बाहर स्लॉट ले लीजिए। यहाँ तक कि अगर किसी दफ्तर में आपकी फाइल धूल फांक रही है, तो पोर्टल पर ‘फाइल मूवमेंट धरना पैकेज’ भी मौजूद होगा!
व्यंग्य के पीछे का दर्द: आखिर लोग सड़क पर क्यों उतरते हैं?
अब एक सीधा सवाल—आखिर लोग सड़क पर क्यों उतरते हैं? सच तो यह है कि कोई शौक से अपना काम-धंधा छोड़कर चिलचिलाती धूप में नहीं बैठता। किसान को फसल का वाजिब मुआवजा नहीं मिलता, कर्मचारी को समय पर हक नहीं मिलता, बीमाधारक को क्लेम के लिए दफ्तरों की चौखटें घिसनी पड़ती हैं और आम नागरिक की फरियाद फाइलों में दबकर रह जाती है।
जब बार-बार गुहार लगाने के बाद भी अफसरों के कान पर जूं नहीं रेंगती, तब मजबूर होकर इंसान सड़क पर उतरता है। इसलिए हर आंदोलन को सिर्फ उपद्रव या तमाशा कह देना भी सरासर नाइंसाफी है। कई आंदोलनों ने ही सोई हुई व्यवस्था को जगाने का काम किया है।
आंदोलन की मर्यादा: किसी बीमार की एंबुलेंस का रास्ता न रुके
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी कम कड़वा नहीं है। जब हर छोटी-मोटी बात का पहला इलाज सड़क जाम करना बन जाए, जब चक्काजाम में फंसी एंबुलेंस के भीतर कोई मरीज दम तोड़ दे, किसी बच्चे का परीक्षा केंद्र छूट जाए और रोज कमाने-खाने वाले मजदूर की दिहाड़ी मारी जाए—तब दिल में यह सवाल कौंधता है कि अपनी मांग मनवाने के लिए हजारों बेकसूरों की जिंदगी को बंधक बनाना कहाँ तक जायज है?
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सिर-आंखों पर, लेकिन दूसरों के आने-जाने और जीने का अधिकार भी उतना ही पवित्र है। आंदोलन की आवाज इतनी बुलंद नहीं होनी चाहिए कि उसके शोर में किसी बीमार की एंबुलेंस का सायरन ही दब जाए!
नया नारा: ‘हम दो, हमारे दो और तीसरा धरना दो!’
और अब आते हैं सबसे दिलचस्प पहलू पर। पहले नारा था—‘हम दो, हमारे दो।’ लेकिन जिस रफ्तार से धरने फल-फूल रहे हैं, कहीं नया नारा यह न बन जाए—‘हम दो, हमारे दो और तीसरा धरना दो!’
वह दिन भी दूर नहीं जब कोई पिता अपने बच्चे से पूछेगा—बेटा, बड़े होकर क्या बनोगे? और बच्चा कहेगा—पापा, मैं डॉक्टर-इंजीनियर नहीं, बड़ा होकर आंदोलन विशेषज्ञ बनूंगा! पिता पूछेंगे क्यों? तो जवाब मिलेगा—क्योंकि देश में समस्याएं कभी खत्म नहीं होंगी, इसलिए इस फील्ड में करियर की अपार संभावनाएं हैं!
चलते-चलते: समाधान दरी पर नहीं, टेबल पर निकले तो बात बने!
खैर, हंसी-मजाक अपनी जगह है, लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि लोकतंत्र की असली खूबसूरती बार-बार सड़क पर दरी बिछाने में नहीं, बल्कि ऐसी संवेदनशील व्यवस्था बनाने में है जहाँ किसी नागरिक को दरी बिछाने की नौबत ही न आए। जब तक टेबल के पीछे बैठे हुक्मरान और जिम्मेदार अफसर फाइलों पर कुंडली मारकर बैठेंगे, तब तक सड़कों पर नारे गूंजते ही रहेंगे।
सरकारों को भी गहराई से सोचना होगा कि अगर जनता की जायज शिकायतों का निस्तारण तय समयसीमा में हो जाए और लोगों को दफ्तरों के धक्के न खाने पड़ें, तो सड़कों से आधे से ज्यादा धरने अपने-आप खत्म हो जाएंगे। आखिर सड़कें चलने के लिए बनी हैं, मरीजों की एंबुलेंस को तेज रफ्तार देने के लिए हैं और देश को गतिमान रखने के लिए हैं—उन्हें हमेशा आंदोलन का अखाड़ा बनाए रखने की जरूरत न पड़े, तभी एक समझदार समाज और मजबूत लोकतंत्र का सपना सच होगा।
और हाँ, अगर इसके बाद भी किसी को ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोलने का मन हो, तो भाई साहब, हमारी तरफ से भी एक फॉर्म रिजर्व समझिएगा!
लेखक परिचय:
यह हास्य-व्यंग्य लेख ‘यशस्वी दुनिया साप्ताहिक’ के संपादक कैलाश विश्वकर्मा द्वारा लिखा गया है।
